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निःस्वार्थ दान से मिलती है असीम आनंद-मुक्तिनाथानन्द 



सद्कर्म से कमाई हुए धन का दान सर्वोपरि-स्वामी 
लखनऊ।राजधानी में सत्संग के दौरान शुक्रवार के प्रातःकालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि वर्तमान युग में निःस्वार्थ दान ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। स्वामी ने कहा कि श्री रामकृष्ण देव जी कहते है जिसके पास धन है उन्हें दान करना चाहिए। कंजूस का धन उड़ जाता है। दाता के धन की रक्षा होती है, जो सद्कर्म मे जाता है। उन्होंने कहा कि कंजूस की कोई चीज मैं नहीं खाता हूं कारण कंजूस बहुत कष्ट करके दान का पैसा निकलता है और परिक्लिष्ट दान राजस दान कहलाता है। वह हमारे बंधन का कारण होता है। श्री रामकृष्ण कहते हैं कंजूस का धन इतने प्रकार उसे नष्ट हो जाता है-मामला मुकदमा में, चोरी डकैती में, चिकित्सा में, बदचलन संतान सब धन उड़ा देती हैं। लेकिन दाता के धन की रक्षा होती है। प्रसँग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि एक उदाहरण देते हुए श्री रामकृष्ण जी ने कहा- कामारपुकुर अर्थात उनके जन्म स्थान में किसान लोग नाला काटकर खेत में जल लाते हैं, कभी-कभी जल का इतना वेग होता है कि खेत का बाँध टूट जाता है और जल निकल जाता है, अनाज बर्बाद हो जाता है इसलिए किसान बांध के बीच-बीच में सुराग बनाकर रखते हैं, इसे घोघी कहते हैं जल थोड़ा-थोड़ा करके घोघी में होकर निकल जाता है तथा जल के वेग से बाँध नहीं टूटता और खेत में मिट्टी की परते जम जाती है उससे खेत उर्वर बन जाता है जिससे अधिक  अनाज पैदा होता है। स्वामी ने कहा कि जो दान- ध्यान करता है वह बहुत फल प्राप्त करता है, चतुवर्ग फल को प्राप्त करता है।इस प्रकार अगर हम अपने सामर्थ्य अनुसार बिना कोई स्वार्थ भावना से खुशी-खुशी दूसरों की मदद करते हुए श्रद्धा सहकार  अपने को लाभान्वित चिंतन करें तब उस दान के पुण्य से हमारा जीवन भगवत् केंद्रित हो जाता है और भगवान भी हमें और भी दान करने का अवसर देते हैं एवं आनंद तृप्ति से हमारा जीवन भरपूर हो जाता है।

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