सीतामढ़ी। धान-गेहूं की खरीदारी का हौवा खड़ा करने से किसानों का भला तो नहीं होता दलालों व कारोबारियों को इसका फायदा जरूर हो जाता है। गेहूं के सीजन में सरकारी खरीदारी का हश्र ही देख लीजिए। सरकार जितने पैसे दे रही है उससे अधिक पैसे बाहरी खरीदार ही दरवाजे पर पहुंचा जा रहे हैं। यही कारण है कि सरकारी माध्यम से अब तक महज 29 क्विंटल (5 मीट्रिक टन) गेहूं की खरीद हो पाई है। एक पखवाड़े में गेहूं की खरीद का ये हाल आपको सरकारी व्यवस्था के प्रति उदासीनता स्पष्ट बयां करती है। सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य 2015 रुपये प्रति क्विंटल की दर से निर्धारित किया है और इस तरह उसको सिर्फ इस जिले में 23 हजार मीट्रिक टन गेंहू की खरीद का लक्ष्य था। पूंजी भी उपलब्ध कराई गई है। 20 अप्रैल से 257 पैक्स और व्यापार मंडलों के माध्यम से छटांक भर गेहूं की खरीद यह भी साबित करती है सरकारी व्यवस्था से लोगों का मोह भंग हो चुका है। किसान सहकारी संस्थानों को गेहूं बेचने की बजाय सीधे धन्ना सेठ -महाजन को तवज्जो दे रहे हैं। दिलचस्प यह भी कि किसानों के साथ सहकारी विभाग के अधिकारी की राय भी एक जैसी ही है। दरअसल, किसानों को जहां सरकार के निर्धारित समर्थन मूल्य से अधिक पैसे मिल जा रहे हैं वहीं विभागीय अधिकारी इसलिए खुश हैं कि कम से कम किसानों को फायदा तो पहुंच रहा है। अधिकारी कहते हैं कि जब किसानों को खुले बाजार में ही सरकारी कीमत से अधिक रेट मिल रहा है तो वे पैक्स के पास क्यों अपना गेंहू बेचेंगे। सरकार ने 2015 रुपये क्विंटल गेंहू की कीमत तय की है, जबकि खुले बाजार में किसानों को 2100 से 2150 रुपए मिल रहे हैं। जिला में जो 29 क्विंटल गेहूं की खरीद हुई है वो सिर्फ दो-चार पैक्सों ने ही खरीद की है। सहकारी संस्थानों के पास गेहूं बेचने के प्रति किसान कितने उदासीन हैं इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जिले के मात्र 350 किसानों ने गेहूं बेचने के लिए अपना रजिस्ट्रेशन कराया है। मनमानी व्यवस्था से दूर भाग रहे-