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 जब जज ही वकील बनकर पैरवी करेंगे तो सजा तो होनी ही है- टिकैत

Tikait

नई दिल्ली। आज तक चैनल से बातचीत करते हुए भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार ने कृषि कानूनों को लेकर बातचीत के लिए कई शर्तें किसानों के आगे रख दी हैं। ऐसे में जब शर्तें रख दी हैं तो बातचीत कहां से होगी। टिकैत ने सरकार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जब जज वकील बनकर पैरवी करेंगे तो सजा तो होनी ही है।

बता दें कि दिल्ली पुलिस ने रविवार को किसान संगठनों से 22 जुलाई से तीन कृषि कानूनों के खिलाफ संसद के समक्ष प्रस्तावित प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों की संख्या कम करने को कहा था, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिव कुमार कक्का ने कहा, ‘‘ हमने पुलिस को सूचित किया कि मॉनसून सत्र के दौरान प्रतिदिन 200 किसान सिंघू बॉर्डर से संसद प्रदर्शन करने जाएंगे। यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन होगा और प्रदर्शकारी की पहचान सुनिश्चित करने के लिए बिल्ले लगाएंगे।

उन्होंने बताया कि पुलिस ने प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक स्थान का प्रस्ताव किया था और किसान संगठनों से प्रदर्शनकारियों की संख्या कम करने को कहा था, जिसे किसान नेताओं ने अस्वीकार कर दिया है। कक्का ने कहा कि पुलिस सोमवार को अपना जवाब देगी, जिसके बाद प्रदर्शन का समय निर्धारित किया जाएगा।गौरतलब है कि पिछले साल सितंबर में बने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान गत नवंबर से ही दिल्ली की सीमा पर तीन स्थानों- सिंघू, टिकरी और गाजीपुर- पर प्रदर्शन कर रहे हैं। 

संयुक्त किसान मोर्चा करीब 40 किसान संगठनों का सामूहिक मंच है, जो केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहा है और उसकी योजना मॉनसून सत्र के दौरान रोजाना संसद के सामने 200 किसानों द्वारा प्रदर्शन करने की है।गौरतलब है कि संसद का मॉनसून सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है और 13 अगस्त को इसके समापन की तारीख तय की गई है। सोमवार से शुरू होने जा रहे संसद के मॉनसून सत्र के दौरान विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने के लिए विपक्षी दलों ने रविवार को रणनीति बनाई और कहा कि आम जनता से जुड़े विषयों को उठाने के लिए हरसंभव संसदीय साधनों का इस्तेमाल किया जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संसद के मॉनसून सत्र से पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक के बाद राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की पहल पर विपक्षी दलों के नेताओं ने आज अलग से एक बैठक की, जिसमें इस बात पर सहमति बनी कि विपक्षी सांसद सरकार पर विधेयकों को जल्दबाजी में पारित करने की जगह इन्हें संसद की स्थायी समितियों को भेजने के लिये दबाव बनाएंगे।

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