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Thursday, October 21, 2021 at 8:02 PM

सम्पादकीय: कोयला संकट

देश के अनेक राज्यों में छाए बिजली संकट का असर कोविड 19 के प्रभाव से उबर रही अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है इसलिए सरकारें इस समस्या से बाहर निकलने के उपाय खोज रहीं हैं। इसका एक और कारण अनेक राज्यों में सन्निकट विधानसभा चुनाव भी हैं। पर सच्चाई यह है कि हमारी सरकारों को फौरी तौर पर संकट से निजात दिलाने के साथ ऊर्जा स्रोतों के स्थाई समाधान के लिए कदम उठाने होंगे।
अपने देश में बिजली उत्पादन के लिए कोयले का भारी उपयोग होता है। इसे लगभग 90 प्रतिशत घरेलू स्रोतों से पूरा किया जाता है और 10 प्रतिशत आयातों से। कई थर्मल बिजली उत्पादन संयंत्र आयातित कोयले पर आधारित हैं। आयातित कोयले के दाम बढ़ने से इनके द्वारा उत्पादित बिजली का दाम बढ़ गया और बिजली बोर्डों ने इस महंगी बिजली को खरीदने से इनकार कर दिया है। फलस्वरूप देश में बिजली का उत्पादन गिरा है और संकट पैदा हो गया है।
हमारी विशेष समस्या यह है कि हम अपनी खपत का 10 प्रतिशत कोयले और 85 प्रतिशत ईंधन तेल का आयात करते हैं। हम वैश्विक बाजार पर इस कच्चे माल के लिए निर्भर हैं। इस कच्चे माल के दाम बढ़ते-घटते रहते हैं लेकिन देश में बिजली का दाम विद्युत् नियामक आयोग लंबे समय के लिए तय करता है। इसलिए कच्चे माल का दाम चढ़ता-उतरता रहता है, जबकि बिजली का दाम स्थिर रहता है। जैसे वर्तमान में कच्चे माल का दाम बढ़ गया है। बिजली के दाम में समानांतर वृद्धि न होने के कारण कुछ बिजली संयंत्रों को उत्पादन बंद करना पड़ा है और संकट पैदा हो गया है।

जैसे कि ऊपर भी जिक्र कर चुके हैं कि कोविड संकट के बाद अर्थव्यवस्थाएं फिर गति पकड़ रही हैं जिससे बिजली की मांग बढ़ी और संकट पैदा हो गया है। देश में कोयले का जितना उत्पादन अप्रैल से सितंबर 2019 में हुआ था, उससे 11 प्रतिशत अधिक उत्पादन अप्रैल से सितंबर 2021 में हुआ है फिर भी खपत के अनुरूप यह पर्याप्त नहीं है।
संकट की एक वजह थर्मल पावर की जगह पर सोलर और विंड पावर के बढ़ते उपयोग के चलते कोयले के उत्पादन से उद्यमियों का ध्यान हटने से भी सम्बंधित है। चूंकि परंपरागत स्त्रोतों पर निर्भरता अभी हमारे देश में जस की तस है, इसलिए कोयले की मांग भी कम नहीं हुई और एक असंतुलन पैदा हुआ।

एक और कारण ग्लोबल वार्मिंग के कारण बिजली उत्पादन में कमी के साथ खपत में वृद्धि का संयोग है। ग्लोबल वार्मिंग ने बिजली के उत्पादन को तीन तरह से प्रभावित किया है। पहला यह कि भारत में कोयले की खदानों में बाढ़ आने से उत्पादन प्रभावित हुआ है। चीन और ऑस्ट्रेलिया में भी कोयले की खानों में बाढ़ आने से उत्पादन में गिरावट आई है। इस कारण कोयले का कुल वैश्विक उत्पादन गिरा और कीमतों में इजाफा हुआ है। दूसरा कारण, बीते समय में विश्व के कई हिस्सों में भयंकर तूफान आए, विशेषकर अमेरिका के तेल उत्पादक राज्यों लुईजियाना और टेक्सास में। जिसके कारण वहां तेल का उत्पादन प्रभावित हुआ। तीसरा कारण, बीते समय में चीन में मौसम सूखा रहा है जिसके चलते जल विद्युत का उत्पादन गिरा है। चीन में वायु की गति भी सुस्त रही है जिसके कारण विंड पावर का उत्पादन भी कम हुआ है।
बहरहाल कोयले के कारण उत्पन्न ये बिजली संकट हमें भविष्य के लिए तैयार रहने के संकेत तो दे ही रहा है।
अब जरुरी है कि हम अपनी ऊर्जा की खपत कम करें,
जिसके लिए हमें ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि करनी पड़ेगी। ऊर्जा के वैकल्पिक संसाधनों के विकास पर जोर भी देना होगा और गति भी लानी होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की सोच इस दिशा में स्पष्ट है। वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में काम भी हो रहे हैं। पर राज्यों को भी संकट से निपटने में साथ देना होगा। राज्यों पर फिलहाल 20 हजार करोड़ का विद्युत बकाया बताया जा रहा है जिसका त्वरित भुगतान हो ताकि कोयले की खरीद में दिक्कत न आए। उपभोक्ता को पेट्रो पदार्थो की तरह भविष्य में बिजली दामों में उतार चढाव के लिए तैयार रहना होगा क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के कारण कोयले के मूल्य में तीव्र उतार-चढ़ाव होते रहेंगे और उसके अनुसार घरेलू व्यवस्था को बदलना होगा, तभी इस प्रकार के संकट का निवारण होगा।