चंद्रशेखर उर्फ रावण की रिहाई करके भाजपा सरकार ने चला बड़ा राजनीतिक दांव


लखनऊ। भीम आर्मी के संस्थापक और सहारनपुर हिंसा के आरोपित चंद्रशेखर उर्फ रावण से रासुका हटाने और उसे समय से पहले ही रिहा कर योगी सरकार ने दलितों को साधने के लिए बड़ा दांव खेल दिया है। राजनीतिज्ञों का मानना है कि लोकसभा चुनाव से पहले भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर उर्फ रावण की रिहाई का ऐलान करके भाजपा सरकार ने बड़ा राजनीतिक दांव चल दिया है। पश्चिमी यूपी में दलितों में मजबूत पकड़ रखने वाले चंद्रशेखर की रिहाई से भाजपा जहां दलितों को रिझाने की कोशिश करेगी, वहीं इससे बसपा के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो सकती है। सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी ने बताया कि चंद्रशेखर की एनएसए की अवधि नौ महीने हो ही चुकी है। इसे तीन महीने सरकार और बढ़ा सकती थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी एक याचिका पर सरकार से जवाब मांगा था। सरकार सुप्रीम कोर्ट में किरकिरी होने से भी बचना चाहती है और चुनाव से पहले राजनीतिक लाभ भी लेना चाहती है। यही चंद्रशेखर की रिहाई की बड़ी वजह है।

मायावती पहले से ही महसूस करती रहीं भीम आर्मी से खतरा
पश्चिमी यूपी में भीम आर्मी का गठन होने के बाद से ही बसपा प्रमुख उससे खतरा महसूस करती रहीं। मायावती ने तो इसे आरएसएस की ही चाल बताया था। हिंसा के बाद मायावती ने अपने ऊपर हमले का भी आरोप लगाया था। इस बीच महागठबंधन की कोशिश के बीच चंद्रशेखर को भी करीब लाने के प्रयास भी तेज हो गए थे। दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के जरिए कांग्रेस चंद्रशेखर पर लगातार डोरे डालती रही है। जिग्नेश ने उनसे कई बार मुलाकात भी की थी और वारणसी में हुए सम्मेलन में यह भी ऐलान कर दिया था कि मायावती उनकी बड़ी बहन हैं। वह और चंद्रशेखर मायावती के दाएं और बाएं हाथ हैं। इससे यह अटकल तेज हो गई थी कि चंद्रशेखर महागठबंधन के साथ आ सकते हैं।

दलितों पर उत्पीड़न के आरोपों से लगातार जूझ रही भाजपा
हाल ही में लखनऊ में हुए बसपा के मंडलीय सम्मेलन में भी बसपा नेताओं ने चंद्रशेखर से मायावती के साथ आने की अपील कर दी थी। उधर, सरकार ने चंद्रशेखर की रिहाई का ऐलान कर इस प्रयास को भी झटका देने की कोशिश की है। दलितों पर उत्पीड़न के लगातार आरोपों से भी भाजपा लगातार जूझ रही है। अब चंद्रशेखर की रिहाई को भी दलितों का आक्रोश कम करने की दिशा में एक कदम बताया जा रहा है। जानकारों का मानना है कि भाजपा चंद्रशेखर का इस्तेमाल मायावती के खिलाफ कर सकती है। इसके अलावा कांग्रेस सहित कई पार्टियों की दलितों की रिझाने की कोशिशों को भी झटका लगेगा।एससी-एसटी ऐक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हुए भारत बंद में दलितों पर मुकदमे लगाए गए थे। इससे यह आक्रोश और बढ़ गया था। वहीं, रावण पर लगातार एनएसए बढ़ाए जाने को भी दलितों में आक्रोश बढ़ रहा था। इसके बाद ऐक्ट में संशोधन कर दलितों का गुस्सा कम करने का प्रयास किया।

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