जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपने अन्दर के अहंकार पर इस तरह काबू और फिर देखें

अपने होने का एहसास होना अच्छी बात है। पर उस एहसास का इस हद तक बढ़ जाना कि कुछ और भान ही न रहे, समस्या पैदा करता है। हम यह स्वीकार ही नहीं कर पाते कि हम भी गलत हो सकते हैं। फिर बात-बेबात हम हर चीज का केंद्र खुद को बनाने लगते हैं। अपने अहं की जड़ों को फैलने से रोकना आसान नहीं होता।

क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ लोग इतने कटु क्यों होते हैं, या बिना किसी कारण आपकी जिंदगी से बाहर क्यों चले जाते हैं? क्या कभी यह सोचा है कि पिछले हजार वर्षों में जितने युद्ध लड़े गए, वे क्यों शुरू हुए? यहां तक कि कुछ युद्ध तो काफी भयानक थे। इनमें न जाने कितनी जिंदगियां खत्म हो गईं। और क्या आपने कभी उन तमाम अपराधों के बारे में सोचा, जो लाखों लोगों की जान ले रहा है? चाहे दांव पर दोस्ती लगे, या युद्ध हो या फिर अपराध, ये सभी एक ही कुख्यात स्रोत से शुरू होते हैं, जो है इगो, यानी हमारा अहंकार। इसे छोड़ना हमारे लिए वाकई बहुत मुश्किल होता है। हमें असलियत में अपने इसी अहंकार से मुक्ति पानी है। मगर इसके लिए सबसे जरूरी यह समझना है कि अहंकार आखिर क्या है? हमें क्यों यह मान लेना चाहिए कि कभी-कभी हम भी गलत हो सकते हैं? अगर आप इन सवालों के जवाब तलाश लेते हैं, तो यकीन मानिए आपका जीवन कहीं ज्यादा सुखद बन जाएगा।

अहंकार क्या है.
चार वर्णों का यह शब्द हमारे कंधे पर बैठे उस शैतान की तरह है, जिसके बारे में हम हमेशा से पढ़ते आए हैं। यह ‘आपका’ वैकल्पिक संस्करण है, जो आपकी तमाम असुरक्षा, भय, घृणा और धारणा को पालता-पोसता है। जो आपके लिए सही है, यह उसका विरोधी है। यह आपके नायकत्व का दुश्मन है। यह आपके प्रकाश के लिए अंधेरा है।

अहंकार, दरअसल एक अपरिपक्व, हाथ-पैर मारने वाला, रोने वाला और तेज चिल्लाने वाला बच्चा है। यह हम सभी के पास है। यह हमसे दूर कहीं नहीं जाता। इससे निपटने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम इसे शांत करने की कोशिश करें। ऐसा करना कई धर्मों का मूल तत्व भी रहा है, खासतौर से पूर्वी देशों के दर्शन में। हालांकि कुछ भाग्यशाली लोग ही अहंकार को परे धकेलने जैसी उपलब्धि अर्जित कर पाते हैं। ईमानदारी से कहूं, तो उनकी राह पर चलकर आज के दौर में सफलता अर्जित करना हमारी बुद्धिमता शायद ही कही जाएगी। तब हमें ऐसा जीवन जीना होगा, जिसे जीने के लिए ज्यादातर लोग तैयार नहीं होंगे। इसलिए बेहतर विकल्प यही है कि हम खुद को इस लायक बनाएं कि जब अहंकार बड़ा हो जाए, तो उसे हम खुद महसूस कर सकें और उसे शांत करने की दिशा में संजीदगी से काम करें। हम इस काम में कदम-दर-कदम आगे बढ़ सकते हैं, हालांकि इसके लिए हमें खुद को संजीदा बनाना होगा जिससे हम जान सकें कि अहंकार की वजह क्या है?.

कहां-कहां है अहंकार.
अहंकार हर जगह है। इसका लगातार विस्तार होता जाता है। जैसे, अहंकार ही वह वजह है कि हर बातों को आप व्यक्तिगत रूप में ले लेते हैं। अहंकार के कारण ही संबंध-टूटने पर आप सामने वाले को नुकसान पहुंचाते हैं। अहंकार की वजह से ही आप सड़क पर किसी दूसरी गाड़ी द्वारा थोड़ी मुश्किल आने पर भी आप अपनी गाड़ी उसके आगे खड़ी करके उसे परेशान करने लगते हैं। अहंकार के कारण ही हम अपनी गलती नहीं मानते। अहंकार के कारण ही हम दूसरों के साथ रूखा व्यवहार करते हैं। इसी कारण अपनी विफलता या अवहेलना हम कतई पसंद नहीं करते। जाहिर है, अहंकार की यह सूची काफी लंबी है। हर दिन हमारा ऐसी तमाम परिस्थितियों से वास्ता पड़ता है, जब हम कई तरीकों से अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हैं। दुर्भाग्य से, इनमें से ज्यादातर मामलों में हमारा अहंकार हमारे आड़े आता है। फिर, जब परिस्थितियां हमारे वश में नहीं रह जातीं या वे हमारे खिलाफ चली जाती हैं, तब हम तुरंत खुद को बदकिस्मत मान बैठते हैं और इसका ठीकरा दूसरे लोगों पर फोड़ने लगते हैं। यह एक बीमार मानसिकता है, जिसका लगातार विस्तार होता जाता है। इसका लाभ कई दूसरे लोग भी उठा सकते हैं। फिर भी, हम हैं कि इस मानसिकता को बदलना नहीं चाहते।

खुद पर दें ध्यान
मुझे यह स्वीकार करने में ऐतराज नहीं है कि जब मैं गलत होता हूं, तो मुझे खुद से नफरत होती है। शायद यह मानने वाला मैं पहला इंसान हूं। इतना ही नहीं, जब मुझे नकारा जाता है, तब भी मुझे नफरत होती है। मैं एक बिंदु पर असफलता से भी नफरत करता हूं और मैं इसे तब तक टालना पसंद करता हूं, जब तक मैं ऐसा कर सकता हूं। मैं इसलिए इन चीजों से डरता हूं, क्योंकि यह मुझे अच्छा महसूस नहीं कराएगा। मेरा मानना है कि इस तरह की इंसानी भावनाएं कभी खत्म नहीं होतीं। थोड़ी-बहुत हमेशा बनी रहती हैं। मगर मैं इस मामले में भी पहला इंसान हूं, जो अपने अहंकार पर नियंत्रण रखता है। खुद पर पर्याप्त काम और अनवरत ध्यान करने की वजह से मैं वह सटीक क्षण बता सकता हूं, जब मेरा अहंकार दिखता है।.

गलती मानने में हर्ज नहीं
मुझे यह भी बखूबी पता है कि कब भय की अधिकता के कारण मैं कुछ खास कदम नहीं उठा पाता। क्या इसे करना आसान है? क्या बस सिर्फ कुछ महसूस कर लेने से अपने अहंकार पर काबू पाया जा सकता है? माफ कीजिए, यह यूं ही नहीं होगा। तब मैं जहन्नुम का वासी हो जाऊंगा, और मेरे कंधे पर सवार प्यारे शैतान को शांत करना असंभव हो जाएगा। मुझे यकीन है कि आप भी कुछ ऐसा ही महसूस कर रहे होंगे। मगर प्रायश्चित या इस समस्या के हल की दिशा में पहला कदम है, अपनी गलतियों को स्वीकार लेना। मैंने अपनी कमियों को स्वीकार करने का प्रयास किया है। आप भी ऐसा करने की कोशिश करें।

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