खुशहाल परिवार के लिए मां—बाप अवश्‍य ध्यान रखें ये बाते

हमारे देश में संस्कृति, संस्कार और शिष्टाचार बच्चों की पाठशाला के सबसे पहले पाठ होते हैं। यही कारण है कि हमारे यहां मां-बाप की जिम्मेदारियां भी कई गुणा ज्यादा बढ़ जाती है। यही नहीं मां-बाप को अपने बच्चे की हर पल हो रही गतिविधियों पर नजर रखनी होती है। असल में हमारे यहां बच्चों की संपूर्ण परवरिश मां-बाप का दायित्व माना जाता है। ऐसे में यदि मां-बाप जरा भी लापरवाही बरतें तो बच्चों का भटकना लाजिमी हो जाता है। हमारे यहां मां-बाप को बच्चों के प्रति अतिरिक्त केयरिंग होना होता है। दरअसल बच्चों के साथ मारपीट का सिलसिला भी हमारे यहां कुछ ज्यादा है। नतीजतन बच्चों को आक्रामक होना, विद्रोही होना तय हो जाता है। ऐसे में मां-बाप की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। यहां हम ऐसे मां-बाप की जिम्मेदारियों की चर्चा कर रहे हैं, जिनके बच्चे फिलहाल पांच से दस साल के बीच हैं। यही उम्र उनका आज और उनका भविष्य तय करती है। इसी उम्र के बीच यह पता चल जाता है कि बच्चा जिद्दी होगा, ईष्र्यालु होगा, आत्मविश्वास से भरा होगा या फिर उसमें क्या कमी होगी।

ध्यान रखें कि बच्चे खुश हैं
मौजूदा समय में जब बच्चे एकांत प्रिय हो चुके हैं। छोटे बच्चे भी इससे अछूते नहीं रहे। वे ज्यादातर समय सोशल नेटवर्किंग साइटों पर गुजारते हैं। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि मां-बाप उनकी खुशियों का ख्याल रखें। इतना ही नहीं उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि उनका खुश दिख रहा बच्चा वास्वत में अंदर से कितना खुश है। कहीं बच्चे के चेहरे की मुस्कान महज उसका बाहरी आवरण तो नहीं। साथ ही अपने बच्चों को दूसरों को खुश रखने की कला में भी माहिर करें।

जिम्मेदार बनें
हालांकि इन दिनों मां और पिता दोनों कामकाजी होते हैं। ऐसे में निःसंदेह बच्चों के प्रति ध्यान कम जाता है। लेकिन इस तरह की लापरवाही से आप अपने बच्चे को खो सकते हैं। वह आपके बजाय बाहर के लोगों से ज्यादा नजदीक हो सकता है। अतः अपने बच्चे के प्रति जिम्मेदार बनें। उसे कब क्या चाहिए, इसकी पूरी जानकारी रखें। इतना ही नहीं यह जानें कि उसे कब आपकी जरूरत है और कब नहीं। जब भी उसे भावनात्मक कमी महसूस हो, उसके पास खड़े रहें। एक दोस्त, एक साथी बनकर।

भरोसेमंद रहें
आपके बच्चे ने यदि आपसे कोई बात भरोसा करके साझा करी है तो फिर उसका भरोसा कभी न तोड़ें। ऐसा करने से यदि आपका बच्चा कभी कोई भूला कर भी दे तो वह तुरंत आपको आकर बताएगा। ऐसा करने से आपके और आपके बच्चे के बीच दोस्ताना बढ़ता है, प्यार बढ़ता है। सबसे महत्वपूर्ण विश्वास बढ़ता है। सुमीता का कहना है, ‘मेरे दो बेटे हैं। मैंने हमेशा उनका विश्वास बनाए रखा, उनकी कही हुई बात मैंने कभी अपने पति से भी साझा नहीं की। ऐसा करने से वे मेरे काफी नजदीक आ गए। जब वे बड़े हुए तब मुझ पर उनका भरोसा बना रहा। ये हमारे दोस्ताना रिश्तों के लिए अच्छे साबित हुए।’

सिखाएं
कहते हैं मा-बाप बच्चों के पहले टीचर यानी गुरु होते हैं। जब भी आपका बच्चा कोई गलती करता है तो तुरंत उसे डाट फटकारने की कोशिश न करें। उसे मारे तो बिल्कुल नहीं। हमारे यहां मां-बाप बच्चों की गल्ती पर तुरंत उस पर हाथ छोड़ देते हैं। यह अच्छा तरीका नहीं है। इस तरह से आप अपने बच्चे को कुछ सिखाते नहीं है अपितु उन्हें अपने से दूर करते हैं। अतः यदि आपका बच्चा कोई भूल कर बैठता है तो उन्हें समझाएं। उन्हें सिखाएं। उन्हें वस्तु विशेष की मूल्य से अवगत कराएं।

नियंत्रण में रखें
बच्चों का दोस्त बनना अच्छी बात है। लेकिन उन्हें नियंत्रण से बाहर रखना सही नहीं है। बात चाहे भारतीय बच्चों की हो या फिर विदेशी बच्चों की। हर जगह बच्चे एक जैसे होते हैं। उन्हें मां से स्नेह और पिता से सिक्युरिटी की चाह होती है। यही कारण है कि बच्चों के दोस्त होने के बावजूद उन्हें नियंत्रण में रखना जरूरी है। ऐसा करने से उन्हें एहसास होगा कि वे जब भी गलत करेंगे, उनकी मां उनके साथ खड़ी रहेंगी। गलत होने भर उन्हें डांटेगी भी और समय आने पर नियंत्रण में भी रखेगी।

स्वतंत्र रहना सिखाएं
हमारे यहां बच्चे बूढ़े होने तक अपने मां-बाप पर निर्भर रहते हैं। असल में मां-बाप खुद अपने बचचों को स्वतंत्र नहीं बनने देना चाहते। जो बच्चे स्वतंत्र होना चाहते हैं, हमारे तथाकथित समाज उन्हें ‘माडर्न’ होने का तमगा देने लगता है। जबकि बच्चों को बचपन से स्वतंत्र होना सिखाना चाहिए। ऐसा करने से भविष्य में उन पर किसी भी प्रकार की विपदा आने से वे उसका डटकर सामना कर सकते हैं। याद रखें कि माता-पिता बच्चों के पहले रोल माडल होते हैं। अतः खुद भी स्वतंत्र रहें और बच्चों को स्वतंत्र बनाएं।

आदर्श बनें
अपने बच्चों के लिए आप खुद आदर्श बन सकते हैं। उनके सामने अपना उदाहरण स्थापित कर सकते हैं। लेकिन हां, अपने बच्चों पर कभी भी दूसरों का उदाहरण थोपने की कोशिश न करें। न पढ़ाई में और न ही जीवन के अनुभव में। ऐसा करने से बच्चों के मन में मां-बाप के प्रति गुस्सा पनपने लगता है। इतना ही नहीं वे अपने मांब-बाप से बातें करने से भी बचने लगते हैं।

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