अस्थमा के मरीजों की संख्या में 5 फीसदी बढ़ोतरी-डॉ. सूर्यकांत 

प्रतिदिन करीब 40 मरीजों को पीडि़त पाते हैं

लखनऊ।  अस्थमा एक दीर्घावधि बीमारी है, जिसमें श्वास मार्ग में सूजन और श्वास मार्ग की संकीर्णता की समस्या होती है, जो समय के साथ कम ज्यादा होती है। एक अनुमान के मुताबिक स्थानीय डॉक्टर्स रोजाना औसतन करीब 40 मरीजों को अस्थमा की बीमारी से पीडि़त पाते हैं, इसमें से करीब 60 फीसदी से ज्यादा पुरुष होते हैं। यह जानकारी केजीएमयू के रेस्पाइरेटी विभाग के अध्यक्ष डॉ. सूर्यकांत ने आज  एक पत्रकार वार्ता के दौरान दी।

डॉक्टर्स का मानना है कि वे बच्चों में अस्थमा के 25-30 नए मामले हर महीने देखते हैं। पिछले एक वर्ष में अस्थमा के पीडि़त मरीजों की संख्या में औसतन 5 फीसदी बढ़ोतरी देखी गई है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इन्हेलेशन थेरेपी लेने वाले मरीजों की संख्या बढ़ी है, लेकिन करीब 20 फीसदी अस्थमा पीडि़त किशोरावस्था से पहले ही या किशोरावस्था के दौरान इन्हेलर का उपयोग बंद कर देते हैं। उन्होंने कहा कि अस्थमा के प्रमुख कारणों में वायु प्रदूषण से लेकर एयर पार्टिकुलेट मैटर्स का बढऩा, धूम्रपान, बचपन में सही उपचार नहीं होना, मौसम में बदलाव जिसकी वजह से कॉमन फ्लू जैसा वायरल इन्फेक्शन होना और सबसे बड़ी बात मरीजों में इसके प्रति भारी अनदेखी है।
वरिष्ठ चेस्ट फिजीशियन डा. बीपी सिंह ने कहा कि इन्हेलर के उपयोग और इस बीमारी की रोकथाम के लिए डॉक्टर्स के साथ मिलकर काम करने से मरीज ज्यादा खुशहाल जिंदगी जी सकेंगे। अस्थमा पर जीत हासिल करने के लिए एक प्रभावी उपचार यानी इन्हेलेशन थेरेपी जरूरी है।
वरिष्ठ बाल रोग चिकित्सक डा. एस निरंजन ने बताया कि कई अध्ययन दर्शाते हैं कि अस्थमा के उपचार में लापरवाही का प्रतिशत 30 से 70 फीसदी तक पहुंचता है। मरीजों के लिए डोज काउंटर्स फायदे की चीज है क्योंकि ये आसान हैं और इससे इन्हेलर में बचे हुए डोज की जानकारी मिल जाती है और इसलिए जरूरत के समय खुराक खत्म होने की परेशानी से बच जाते हैं। 1 वर्ष के बच्चे से लेकर हर उम्र के मरीजों में हल्के और भारी अस्थमा में इन्हेल्ड कोर्टिकोस्टरॉइड (आईसीएस) थेरेपी लेने की सलाह दी है।

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