विचार मित्र

जेएनयू में शिक्षा की आड़ में पनप रही देशविरोधी संस्कृति

राजेश माहेश्वरी

फीस वृद्धि को लेकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसी बीच मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने तीन सदस्यीय एक समिति गठित की है, जो जेएनयू की सामान्य कार्यप्रणाली बहाल करने के तरीकों पर सुझाव देगी। इसके बावजूद छात्रों ने संसद तक मार्च निकाला। छात्रों का कहना है जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में देश के गरीब परिवार के बच्चे आसानी से शिक्षा हासिल करते हैं। शुल्क बढ़ने से ऐसा हो पाना कठिन होगा।

छात्रों का कहना है कि हॉस्टल नियमों के तहत फीस बढ़ोतरी का असर 40 फीसदी छात्रों पर पड़ेगा। पिछले कई सालों से जेएनयू किसी न किसी तरह से चर्चाओं में बना हुआ है। समय-समय पर जेएनयू के छात्रों पर देशद्रोही होने के आरोप लगते रहे हैं। विश्वविद्यालय कैम्पस से जो आवाजें बाहर आ रही हैं या जो कुछ भी मीडिया के माध्यम से देश को पता चल रहा है, उसका सार यह है कि जेएनयू का कैम्पस देशविरोधी ताकतों को अड्डा बनता जा रहा है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय है। इसने शिक्षा के क्षेत्र में असंख्य होनहार विद्वान देश को दिए हैं। शोधार्थियों की एक भरी-पूरी जमात है, जो विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं, अन्य सम्मानित पदों पर हैं, पत्रकार हैं और विदेशों में सक्रिय हैं। इस साल अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अभिजीत बनर्जी भी जेएनयू के छात्र रहे हैं। ऐसी महान परंपरा के बावजूद हिंदू धर्म और भारतीय सभ्यता-संस्कृति के महानायक स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अपमान किया जाए।

उसके नीचे ‘भगवा जलाओ’ और ‘फासिज्म’ सरीखे शब्द लिख दिए जाएं, देशविरोधी हरकतों का अड्डा बन जाए और कई स्तरों पर ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की गुंडई दिखाई दे, महिला पत्रकार से बदसलूकी, हाथापाई की जाए, तो इसे जेएनयू की कौन-सी परंपरा और जमात कहेंगे? स्वामी विवेकानंद ने हमारी युवा पीढ़ी में उच्च नैतिकता, हमारी महान संस्कृति और देशभक्ति की भावना भरने का आह्वान किया था। लेकिन, जेएनयू में युवा विभाजनकारी एजेंडे की शिक्षा पाते दिखाई देते हैं। कमोबेश देश की सरकार भी अब सोचना शुरू कर दे कि शिक्षा की आड़ में तो देशविरोधी संस्कृति नहीं पनप रही है?

भाजपा के सरकार में आने के बाद जेएनयू पर लगातार देशद्रोह के आरोप लगते रहे हैं। दो साल पहले 9 फरवरी 2016 को जेएनयू विश्वविद्यालय परिसर में हुए एक कार्यक्रम में कथित तौर पर देश विरोधी नारे लगे थे। इस सिलसिले में जेएनयू छात्रसंघ के उस समय के अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके दो साथियों उमर खालिद और अनिर्बन को गिरफ्तार किया गया था। हालांकि तीनों बाद में जमानत पर छूट गए। लेकिन कन्हैया कुमार इससे पहले 23 दिन जेल में रहे। इस केस को तीन साल हो चुके हैं लेकिन अभी तक दिल्ली पुलिस की तरफ से मामले में कोई चार्जशीट फाइल नहीं की गई है।

कैंपस के अंदर कथित रूप से देशद्रोह के नारे लगाने वाली घटना के बाद सेना से रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल निरंजन सिंह की अगुवाई में आठ सैनिकों ने वीसी से मुलाकात की थी और विश्वविद्यालय के अंदर का माहौल बदलने की गुजारिश की थी। बेशक यह भारत सरकार के दायित्वों में शामिल है कि उच्च शिक्षा भी सुलभ और सस्ती हो, ताकि शिक्षित और बौद्धिक पीढियां सामने आ सकें। शायद इसीलिए जेएनयू का बजट 556 करोड़ रुपए है और सबसिडी 352 करोड़ रुपए की है।

औसतन एक छात्र पर चार लाख रुपए की सालाना सबसिडी खर्च की जाती है। सुविधाएं ऐसी हैं कि होस्टल में मात्र 10 रुपए माहवार किराए पर कमरा उपलब्ध है। बिजली, पानी, सर्विस चार्ज अभी तक निशुल्क रहे हैं। क्या ये सुविधाएं भारत-विरोधी नस्लें तैयार करने को दी जाती हैं? सरकार को केवल जेएनयू ही नहीं देश के सभी विश्वविद्यालयों में सस्ती शिक्षा की सुविधा प्रदान करने का प्रबंध करना चाहिए। लेकिन इन सबके बीच भारत के गरिमामय महानायक विवेकानंद ने छात्रों का क्या बिगाड़ा था कि उनकी प्रतिमा को अपमानित किया गया? उन्हें ‘फासीवादी’ करार दिया गया? प्रतिमा को तोड़ने तक की कोशिशें की गईं? उस पर हिंसक प्रहार भी किए गए और लिख दिया गया-‘‘भगवा जलाओ।’’ कौन-सा भगवा ? और उसे क्यों जलाया जाए? क्या इसलिए कि वह भाजपा का एक प्रतीक-रंग है ? लेकिन भगवा रंग तो राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगे’ में भी है।

दरअसल जेएनयू के भीतर यह जमात वह है, जो मृतप्रायः वामपंथ का झंडा उठाने का काम करती रही है। और शिक्षा की आड़ में और छात्र हितों की मांग की आड़ में वो देशविरोधी और वामपंथी एजेण्डे का आगे बढ़ाने का काम करती है। जेएनयू का एक खास विचारधारा का अड्डा भी माना जाता है। लोकतंत्र में विभिन्न विचारधाराओं का सदैव स्वागत किया जाता है, लेकिन वो विचारधारा किस काम की जो देश को बांटने और देश के दुश्मनों के साथ खड़ी दिखाई दे।

कश्मीर आर्टिकल 370 हटाने के खिलाफ जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन हुआ और नारे लगे थे। इस सभा के वीडियो सामने आए हैं जिसमें कई नारे सुनाई दे रहे हैं और इन पर सवाल उठने लगे थे। वास्तव में जेएनयू में एक जमात भारत की बर्बादी तक जंग के नारे लगाती है। वजह यह है कि माओवादियों, जेहादियों और कश्मीरी अलगाववादियों के बीच सांठगांठ लंबे समय से जारी है। इसका जीता-जागता सबूत अक्टूबर 2010 में जेएनयू में वह सेमिनार था जिसमें हुर्रियत के नेता सैयद अली शाह गिलानी, अरुंधति राय और माओवादी नेता वरवरा राव ने मंच साझा किया था।

सेमिनार का विषय था ‘आजादी ही एकमात्र रास्ता।’ उसमें बड़ी संख्या में जेएनयू छात्रों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा, इन तत्वों ने 2010 में दंतेवाडा में सीआरपीएफ के 74 जवानों की हत्या पर जश्न भी मनाया था। इससे इन तत्वों के इरादों का पता चलता है। 2000 में जेएनयू में एक वामपंथी संगठन के दोस्ताना मुशायरे में सेना के दो जवानों को बुरी तरह पीटा गया, क्योंकि उन्होंने मुशायरे में देशविरोधी शायरी का विरोध किया था।

देश में करीब 800 विवि हैं, लेकिन यह चिंतनीय सवाल होना चाहिए कि जेएनयू के भीतर ही विवाद क्यों पनपते हैं? बात-बात पर आजादी के नारे लगाने वाले जेएनयू के छात्रों को किससे और क्यों आजादी चाहिए। क्या उन्हें आजादी अपनी मातृभूमि के खिलाफ साजिश रचने के लिए चाहिए? या बंटवारे का एक और माहौल तैयार करने के लिए? हमारी अपनी ही संस्कृति को बर्बाद करने की आजादी का तो मतलब यह है कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत का पालन न किया जाए। हमारे महान भारतवर्ष में सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों का पालन किया जाता है, जहां सभी धर्मों को समान नजरिए से देखा जाता है।

सनातन धर्म का विचार इतना व्यापक है कि उसके दायरे में सभी धर्म और सिद्धांत समा जाते हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि हमारी सांस्कृतिक सीमाओं से बाहर के इन गुमराह तत्वों की विभाजनकारी नीतियों को स्वीकार न किया जाए, न ही किसी को हमारे युवाओं के दिलोदिमाग को प्रदूषित करने की इजाजत दी जाए। जेएनयू में जो पिछले दो-तीन साल में में हुआ, वह बेहद निंदनीय है। यह सतर्क हो जाने की चेतावनी की तरह है। आखिर राष्ट्रीय चरित्र का एक विश्वविद्यालय, जिसकी शिक्षा की गुणवत्ता, बौद्धिक और संतुलित असहमति के नाते सराहना की जाती रही हो, आज गलत वजहों से बगावत का केंद्र बन गया है।

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