Friday, November 27, 2020 at 2:00 PM

अबकी परिवर्तन के बयार में बह चला बिहार…

-भूले जंगलराज, मतलब नहीं सुशासन राज से, अब बस रोजगार

-कोरोना महामारी ने बदला बिहारियों का मूड-मिजाज

-राज्य में रुके हुए श्रमिक वोटर बदल सकते हैं सत्ता के समीकरण

रवि गुप्ता
लखनऊ, 27 अक्टूबर(तरुणमित्र)। बिहार की सत्ता पर अबकी बार कौन सत्तासीन होगा…कौन जीत की दीवाली मनायेगा तो कौन पराजय का अमावस चखेगा, यह निश्चित तौर पर बिहार के मतदाता तय करेंगे। लेकिन वहां के कुछ प्रमुख राजनीतिक जानकारों की मानें तो मौजूदा परिदृश्य और साथ ही जनता-जनार्दन का हाव-भाव व मूड-मिजाज यही दर्शा है कि…अबकी परिवर्तन के बयार में बिहार बहता प्रतीत हो रहा है। राजधानी पटना के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की मानें तो कोरोना महामारी ने दरअसल अधिकांश बिहारी लोगों के मन-मस्तिष्क पर गहरा असर डालने का काम किया है। उनके मुताबिक बिहारियों को न तो अब प्रदेश में कभी रहे जंगलराज की याद आती है और न ही अब सुशासन राज से उन्हें कोई खास मतलब रह गया है…उनका सारा फोकस अब केवल और केवल रोजगार पर केंद्रित है। बहरहाल, चुनावी दंगल में हर दल अपने-अपने हिसाब से एकदूसरे को पटखनी देने में लगा हुआ है। राज्य में रोजगार की संभावनाओं के दृष्टिगत मौजूदा चुनाव में चल रहे जुबानी तीर पर गौर करें तो कोई यह दलील दे रहा है कि क्या करें बिहार चारों तरफ जमीन से घिरा हुआ है और यहां पर समंदर नहीं है, इसीलिये कोई उद्यमी इधर की ओर रुख नहीं कर रहा। दूसरी तरफ कोई सत्ता में आने के बाद सीधे युवाओं को 10 लाख रोजगार देने का वादा करता दिख रहा है। कोई लड़कियों को साइकिल तो कोई यूपी के अखिलेश सरकार की तरह लैपटॉप देने का लॉलीपाप देने में लगा हुआ है।
परिणामस्वरूप ऐसे में इसी अहम मुद्दे को जो भी दल-गठबंधन-पार्टी अधिक से अधिक बिहार के जन-जन के समक्ष रख पाने में सफल होगा, संभवत: बिहार के राज सिंहासन की राह उसके लिये औरों की अपेक्षा कहीं अधिक आसान और निष्कंटक साबित हो सकती है। जगजाहिर है कि बिहार की एक बड़ी आबादी देश-प्रदेश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रूपों में श्रम-रोजगार, उद्योग-धंधे और कल-कारखाने में लगी रहती है। ऐसे में हर साल बिहार से बड़ी संख्या में लोगों का पलायन अन्य राज्यों के लिये होता है। मगर कोरोना की वजह से क्रमवार लगते लॉकडाउन ने इन पलायित श्रमिकों को फिर से उन्हें अपने राज्य की ओर वापस आने को मजबूर कर दिया। जानकारों की मानें तो भले ही इस समय अनलॉक होने के चलते स्थितियां सामान्य हो गई हैं, लेकिन अभी भी बडेÞ पैमाने पर तमाम ऐसे श्रमिक हैं जो बिहार के अपने गृह क्षेत्र गांव या कस्बे में रुके हुए हैं। वहीं इसी बीच बिहार में चुनावी माहौल बन गया तो इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि अबकी बार सूबे का मालिक कौन होगा इसे तय करने में ऐसे श्रमिकों की भूमिका कहीं अधिक प्रभावी साबित हो सकती है।

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