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आखिर शरद पवार ने क्यों दिया शिवसेना को ही समर्थन?

हरिगोविंद विश्वकर्मा

अब जबकि महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-कांग्रेस की महा विकास अघाड़ी सरकार ने राज्य विधान सभा में बहुमत हासिल कर लिया है। इस बात पर चर्चा करना समीचीन होगा कि महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने अपने दो धुर विरोधी दलों भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना में से शिवसेना को ही समर्थन देने और तीन दलों की महा विकास अघाड़ी बनाकर राज्य सरकार में शामिल होने का फ़ैसला क्यों किया?

जब से शरद पवार ने यह निर्णय लिया है, तब से राजनीतिक टीकाकार इस बात पर माथा-पच्ची कर रहे हैं कि आख़िर मराठा क्षत्रप ने शिवसेना को ही समर्थन क्यों दिया? जब किसी दक्षिणपंथी दल के साथ जाना ही था तो पवार भाजपा के साथ क्यों नहीं गए, जबकि 2014 के विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत न मिलने पर उन्होंने भाजपा को समर्थन देने के साफ संकेत दे दिए थे। तो इस बार पवार ने भाजपा की बजाय शिवसेना को क्यों चुना? इस मुद्दे पर राजनीतिक टीकाकार आगे भी लंबे समय तक सिर खपाते रहेंगे। दरअसल, महाराष्ट्र की सत्ता के कॉरीडोर से परिचित लोग मानते हैं कि भाजपा के साथ जाने पर पवार को फ़ायदा ही फ़ायदा था। भाजपा के साथ गठबंधन बनाने पर मुमकिन था कि कांग्रेस पवार का साथ न देती लेकिन इसके बावजूद पवार साहब के दोनों हाथ में लड्डू होते।

मसलन, पहला लाभ यह होता कि एनसीपी को केंद्र सरकार में एक या वह चाहती तो दो मंत्री पद मिल सकते थे। मतलब ख़ुद पवार और उनकी लोकसभा सदस्य बेटी सुप्रिया सुले या सीनियर एनसीपी लीडर प्रफुल्ल पटेल केंद्र में कैबिनेट मंत्री बन सकते थे। दूसरा एनसीपी के जिन नेताओं के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं, उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता। ज़ाहिर है इससे क़रीब 25 हज़ार करोड़ रुपए के महाराष्ट्र सहकारी बैंक घोटाले में मनी लॉन्डरिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय के राडार में आए ख़ुद शरद पवार और सिंचाई विभाग में कई हज़ार करोड़ के घोटाले में कथित तौर पर शामिल उनके भतीजे अजित पवार को राहत मिल सकती थी।

इक़बाल मिर्ची के साथ कारोबारी रिश्ते के गंभीर आरोप का सामना कर रहे सीनियर एनसीपी लीडर प्रफुल्ल पटेल प्रवर्तन निदेशालय के शिकंजे से बच सकते थे। इसके अलावा दिल्ली के महाराष्ट्र सदन समेत कई घोटाले में कथित तौर पर शामिल होने के कारण लंबे समय तक जेल में बंद रहे छगन भुजबल और जयंत पाटिल को भी फ़ौरी तौर पर राहत मिल सकती थी। ऊपर से भाजपा के साथ महाराष्ट्र में सरकार बनाने से शरद पवार जितना चाहते, उन्हें मंत्री पद मिल जाते। जबकि शिवसेना के साथ जाने से उनको 12 से अधिक मंत्री पद नहीं मिलने वाला। इसके बावजूद शरद पवार ने शिवसेना का साथ दिया।

कहा जाता है कि अजित पवार को एनसीपी संसदीय दल का नेता चुने जाने के लिए हुई निर्वाचित विधायकों की बैठक में ख़ुद अजित पवार और धनंजय मुंडे भाजपा के साथ सरकार बनाने की पैरवी कर रहे थे, जबकि नवाब मलिक और दूसरे नेता भाजपा की बजाय शिवसेना को समर्थन देने की बात कर रहे थे। सबकी राय सुनने के बाद शरद पवार ने अपना फ़रमान सुनाया। वह फ़रमान था कि एनसीपी भाजपा के साथ नहीं, बल्कि शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाएगी।

दरअसल, एनसीपी में शरद पवार का क़द इतना ज़्यादा विशाल है कि बाक़ी सभी नेता उनके सामने बौने नज़र आते हैं। किसी में उनकी बात काटने की न कूवत है न हिम्मत। लिहाज़ा, सबके सब ने चुपचाप साहेब का आदेश शिरोधार्य कर लिया और यह निश्चित हो गया कि अगली सरकार में एनसीपी और कांग्रेस शामिल होंगे, क्योंकि कांग्रेस में भी पवार के फ़ैसले को काटने की किसी में हिम्मत नहीं है। इसके बाद आगे की रणनीति पर काम होने लगा। जब मीडिया में ख़बर आई कि एनसीपी शिवसेना के साथ सरकार बनाएगी तो लोग भी हैरान हुए कि एनसीपी शिवसेना के साथ सरकार कैसे बनाएगी और उसमें कांग्रेस किस भूमिका में शामिल होगी? दरअसल, इसका जवाब खोजने के लिए शरद पवार के राजनीतिक जीवन पर नज़र डालनी पड़ेगी।

पवार पहली बार 18 जुलाई 1978 को मुख्यमंत्री बने थे। इसके लिए उनको अपने गुरु वसंतदादा पाटिल की सरकार गिरानी पड़ी थी। वह 20 महीने मुख्यमंत्री रहे। दूसरी बार वह 26 जून 1988 को मुख्यमंत्री बने जब राजीव गांधी ने उन्हें कांग्रेस में वापस लिया। इस बार वह लगभग तीन साल मुख्यमंत्री रहे। तीसरी और अंतिम बार शरद पवार 6 मार्च 1993 को मुख्यमंत्री बने और दो साल तक शासन किया।

1995 के विधानसभा चुनाव कांग्रेस हार गई और पहली बार राज्य में शिवसेना-भाजपा भगवा गठबंधन सरकार बनी। 1999 में शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर एनसीपी बना ली और अपने बूते पर चुनाव में उतरे थे। 1999 के चुनाव में शिवसेना (69) और भाजपा (56) का गठबंधन केवल 125 सीट जीत सका। सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 20 विधायक का समर्थन भगवा गठबंधन को नहीं मिल सका। इसके बाद सरकार बनाने के लिए 75 सीट जीतने वाली कांग्रेस और 58 सीट जीतने वाली एनसीपी के बीच पोस्टपोल गठबंधन हुआ। 15 निर्दलीय विधायकों के समर्थन से विलासराव देशमुख पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने।

एनसीपी सरकार में अहम पार्टनर थी और सरकार उस पर निर्भर थी। लिहाज़ा, रोज़ाना सुबह-सुबह शरद पवार का फोन मुख्यमंत्री के सरकारी आवास वर्षा में आने लगा। पवार साहब देशमुख को ज़रूरी दिशा-निर्देश देते थे। चूंकि सरकार पवार के समर्थन के बिना चल नहीं सकती थी, इसलिए रोज सुबह पवार साहब का कॉल अटेंड करना देशमुख की मजबूरी थी। चुनाव से कुछ महीने पहले देशमुख की जगह सुशील कुमार शिंदे मुख्यमंत्री बने। उनको भी रोज़ाना पवार साहब का फोन अटेंड करना पड़ता था।

इसी तरह 2004 के चुनाव में भी शिवसेना (62)-भाजपा (54) गठबंधन को 116 सीट मिली। इस बार कांग्रेस की सीट 75 से घटकर 69 हो गई, जबकि एनसीपी 58 से 71 पर पहुंच गई। लेकिन पवार साहब ने मुख्यमंत्री पद पर दावा नहीं किया। वह उपमुख्यमंत्री पद से संतुष्ट हो गए। विलासराव देशमुख दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। इस बार भी रोज़ सुबह उनको पवार का कॉल अटेंड करना पड़ता था। 2008 में मुंबई पर आतंकी हमले के बाद क्षतिग्रस्त होटल ताज में बेटे रितेश देशमुख और फिल्मकार रामगोपाल वर्मा को ले जाने की गलती पर देशमुख को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा और अशोक चव्हाण नए मुख्यमंत्री बने। उनको भी रोज़ सुबह पवार साहब का फोन कॉल लेना पड़ता था।

2009 के चुनाव में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिली और 144 सीट जीतकर यह गठबंधन बहुमत (145) के मुहाने पर पहुंच गया। हालांकि एनसीपी 71 से 62 सीट पर आ गई, लेकिन कांग्रेस 69 से 82 पर पहुंच गई। राज्य में फिर कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार बनी। अशोक चव्हाण पहली बार से अधिक शक्तिशाली मुख्यमंत्री के रूप में सत्तानशीं हुए। लेकिन पवार साहब का कॉल उनको लेना ही पड़ता था। महीने भर में ही आदर्श घोटाले के कारण चव्हाण की कुर्सी चली गई। 11 नवंबर 2010 को दिल्ली से पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री बनाकर भेजे गए। अब वर्षा में आने वाले पवार साहब के कॉल वही अटेंड करते थे। यह सिलसिला 2014 तक चला।

2014 में नरेंद्र मोदी लहर में पूरे देश की तरह यहां भी कांग्रेस-एनसीपी को पराजय का मुंह देखना पड़ा। भाजपा और शिवसेना ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। इस चुनाव में भाजपा को शानदार सफलता मिली परंतु 122 सीट जीतने के बावजूद भाजपा सत्ता से 23 सीट पीछे थी। लिहाज़ा, पवार ने भाजपा को समर्थन देने का साफ़ संकेत दे दिया। इससे शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे पर नवनिर्वाचित विधायकों का सरकार में शामिल होने के लिए ज़बरदस्त दबाव पड़ा और नौबत शिवसेना में विभाजन की भी आ गई। मजबूरी में उद्धव छोटे भाई के रूप में भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार में शामिल होने के लिए तैयार हुए और देवेंद्र फड़णवीस राज्य के मुख्यमंत्री हुए।

शपथ लेने के बाद फडणवीस जैसे ही वर्षा में शिफ़्ट हुए, उन्हें रोज़ सुबह पवार साहब के कॉल आने लगे। फडणवीस नए-नए चीफ़मिनिस्टर बने थे, सो अनिच्छा के बावजूद वह पवार के कॉल अटेंड कर लेते थे। कुछ समय बाद उनको लगा कि वर्षा में कॉल करना और मुख्यमंत्री को ज्ञान देना पवार का शगल बन गया है। लिहाज़ा, उन्होंने पवार साहब का कॉल नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया। उनके नज़रअंदाज़ करने के बावजूद कुछ दिन तक पवार साहब के कॉल आते रहे लेकिन धीरे-धीरे कॉल आने बंद हो गए।

2019 के चुनाव में भाजपा को अपने बल पर बहुमत न मिलने से सत्ता की चाबी एक बार फिर पवार के हाथ में आती दिखी। अंतिम नतीजे आने से पहले ही उन्होंने अपने क़रीबी शिवसेना प्रवक्ता संजय राऊत की ओर चारा फेंक भी दिया। पवार जानते थे कि फडणवीस सीएम बनेंगे तो उनका कॉल अटेंड नहीं करेंगे, लेकिन शिवसेना का सीएम ऐसी हिमाक़त नहीं कर सकता। शिवसेना मुख्यमंत्री पद की लालच में पवार साहब के जाल में उलझ गई।

चुनाव में सत्ता के लिए 50-50 प्रतिशत की भागीदारी की बात करने वाली जो शिवसेना 124 सीट मिलने और चुनाव प्रचार में देवेंद्र फडणवीस का बार-बार नाम उछाले जाने पर चुप रही उसी पार्टी ने भाजपा को बहुमत से 40 सीट दूर देखकर उसके सामने ढाई साल का मुख्यमंत्री पद देने का प्रस्ताव रख दिया। इसे भाजपा स्वीकार नहीं कर सकती थी। लिहाज़ा, पार्टी ने विपक्ष में बैठने का फैसला किया। यही तो शरद पवार साहब चाहते थे। लिहाज़ा, उनकी पसंद के उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बन गए हैं। क़रीब पांच साल बाद अब फिर पवार साहब का कॉल मुख्यमंत्री सीधे अटेंड करेगा। यही तो पवार साहब चाहते थे, इसीलिए उन्होंने मज़बूत भाजपा (105 सीट) की जगह कमज़ोर शिवसेना (56 सीट) को समर्थन देने का फैसला किया और सरकार बनवाकर अमित शाह से बड़े चाणक्य का तग़मा हासिल कर लिया।

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