विचार मित्र

भाजपा को विधानसभा चुनावों में रणनीति बदलनी होगी

राजेश माहेश्वरी

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली चुनाव में फिर एक बार बाजी मारी है। कुल मिलाकर जैसा आकलन किया जा रहा था दिल्ली विधानसभा चुनाव में वैसा ही हुआ। आम आदमी पार्टी ने स्थानीय मुद्दों पर फोकस किया और नतीजे उनके पक्ष में गए। भाजपा को लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम और काम का जो लाभ मिला ठीक वही फायदा अरविन्द केजरीवाल को दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिला।

मोदी के विरूद्ध जिस तरह विपक्ष ने खूब हायतौबा मचाया वैसा ही केजरीवाल के साथ हुआ। लोकसभा में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में अपनी कार्यों के आधार पर संसद की सीटें मांगीं लेकिन दिल्ली की जनता ने भाजपा को चुनना बेहतर समझा और आप को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। लेकिन मात्र आठ महीने बाद ही उसी आम आदमी पार्टी को फिर सिर आंखों पर बिठा लिया और सातों लोकसभा सीटें जीत चुकी भाजपा को 8 सीटों पर समेट दिया।

दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों में देश की भविष्य की राजनीति के कई संकेत छिपे हैं। पहला ये कि भाजपा को प्रादेशिक स्तर पर गंभीर किस्म के सक्षम नेतृत्व को आगे लाना होगा और वहीं आम आदमी पार्टी के लिए भी ये संदेश है कि अपनी सीमा से बाहर निकलकर हाथ पांव मारने से बचें क्योंकि राष्ट्रीय स्तर तो बड़ी बात है किसी पड़ोसी राज्य में भी आम आदमी पार्टी को दिल्ली जैसी सफलता मिलना जागती आंखों से सपने देखने जैसा होगा।

भाजपा ने इस चुनाव में अपनी सारी ताकत झोंकने का काम किया। दिल्ली के चुनाव परिणाम ने एक बार फिर भाजपा को झटका दे दिया है। हालांकि, 2015 के चुनाव के मुकाबले भाजपा की सीटों में इजाफा जरूर हुआ लेकिन, सीटों की संख्या बहुमत के जादुई आंकड़े को नहीं छू सकी। जरूरी है कि भाजपा आत्मावलोकन करे। दरअसल, 2014 के आम चुनाव में जब पहली बार भाजपा बहुमत के साथ केन्द्र में सत्ता में आई तब कई फैक्टर काम कर रहे थे। उनमें प्रधानमंत्री मोदी की लहर सबसे अहम मानी जाती है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दिल्ली की सभी सातों सीटें जीत ली थी।

तब भाजपा को 46.40 फीसद वोट मिले थे। लेकिन 2015 में दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुआ तो बाजी एकदम से पलट गई। भाजपा के वोट फीसद में बड़ी गिरावट आई। लेकिन, ‘आप’ के वोट फीसद में जबरदस्त उछाल आया और उसे 54.3 फीसद वोट मिले। लेकिन, जब 2019 में फिर लोकसभा चुनाव होता है तो भाजपा को जबरदस्त बढ़त मिलती है और उसे 56.58 फीसद वोट मिलते हैं। नतीजतन, वह फिर से दिल्ली की सातों सीटें जीत जाती है। वहीं, ‘आप’ के वोट में जबरदस्त गिरावट आती है। अब 2020 के विधानसभा चुनाव में कहानी लगभग 2015 वाली फिर से दोहराई गई है।

वास्तव में लोकसभा और विधानसभा के लिए लोगों की पसंद अलग-अलग है। कोई एक पार्टी दिल्ली की जनता के लिए दोनों ही चुनाव में फिट नहीं बैठती। जब राष्ट्रीय यानी आम चुनाव हो तो, जनता उन्हें वोट देना पसंद करती है जो केन्द्र में सरकार बनाने का दमखम रखते हों और जब मामला विधानसभा चुनाव का हो तब लोग उन्हें पसंद करते हैं जो स्थानीय मुद्दों के लिहाज से उन्हें उपयुक्त लगें। ऐसा ही ट्रेंड कई राज्यों के चुनाव में देखने को मिला है।

जमीनी स्तर पर दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजों की समीक्षा करें तो भाजपा से जो चूक हुई है वह यह कि भाजपा दिल्ली के पूरे चुनाव प्रचार में स्थानीय मुद्दों पर ठीक से अपनी बात नहीं रख सकी। भाजपा ने यह समझने में गलती की कि दिल्ली की मौजूदा सरकार किस-किस काम को करने का दावा कर रही है और वह किन मुद्दों पर वोट मांग रही है। लेकिन, भाजपा केजरीवाल की काट ढूंढ़ने की बजाय अलग तरह की रणनीतियों पर काम करती दिखी। स्थानीय मुद्दों के मद्देनजर भाजपा से लोगों का मोहभंग होने लगा है। शायद भाजपा की सरकारें लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकीं। ऐसे में यह जरूरी है कि भाजपा लोगों की बुनियादी जरूरतों और स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करने की रणनीति पर विचार करे। बहरहाल, देखना होगा कि राज्यों में लगातार हार के बाद भाजपा कितनी ईमानदारी से आत्मचिंतन करती है।

जहां तक बात उनके राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर उभरने की है तो ये काफी मुश्किल है क्योंकि आम आदमी पार्टी एक क्षेत्रीय भी नहीं अपितु महानगरीय पार्टी ही है और उसका अस्तित्व भी तभी तक है जब तक वह दिल्ली में केन्द्रित रहेगी। भारतीय राजनीति की तासीर ये रही है कि क्षेत्रीय या स्थानीय पार्टी के नेता ने जब भी राष्ट्रीय स्तर पर उभरने की कोशिश की उसका मूल जनाधार कमजोर होता गया।

तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत की क्षेत्रीय पार्टियों ने इस फार्मूले को अपनाते हुए अपने प्रभावक्षेत्र को समझकर उससे बाहर निकलने का दुस्साहस नहीं किया जिसकी वजह से वे अनेक दशकों से अपनी ताकत संजोकर रख सकीं। वैसे दिल्ली के चुनाव में भाजपा ने एक तरह से अपनी वापिसी कर ली वरना ये आशंका भी थी कि कहीं केजरीवाल नामक करिश्मे में उसकी हालत भी कांग्रेस जैसी होकर न रह जाए। आम आदमी पार्टी आन्दोलन से निकली पार्टी और अरविन्द केजरीवाल ही उसके चेहरे हैं।

उन्हें मालूम है कि आन्दोलन के साथियों को बराबरी से बिठाने पर उनकी महत्वाकांक्षाएं परवान चढने लगती हैं। और वे अपनी कीमत मांगने लगते हैं। इसीलिए 2015 की ऐतिहासिक जीत के बाद उन्होंने बड़ी ही चतुराई से पार्टी खड़ी करने के लिए एक करोड़ का का चन्दा देने वाले शांति भूषण के अलावा प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, कुमार विश्वास और प्रोफेसर अरुण कुमार जैसे नींव के पत्थरों को निकाल बाहर किया। योगेंद्र यादव के साथ तो धक्का मुक्की तक की गई।

इस चुनाव में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया का मतगणना में काफी देर तक पीछे बने रहना भी एक संकेत है कि दूसरे स्थान वाला अपने को पहले के लायक समझने की भूल न करे। चुनाव नतीजों को भाजपा और उसके द्वारा उठाये जा रहे राष्ट्रीय मुद्दों और हिन्दू मतों के धु्रवीकरण की पराजय मानने वाले दरअसल सतही आकलन करने की गलती कर रहे हैं। इस परिणाम को शाहीन बाग की जीत बताने वालों की राजनीतिक समझ पर भी हंसी आती है।

एक राष्ट्रीय पार्टी किसी चुनाव में अपनी हैसियत के लिहाज से बात करे तो उसमें गलत क्या है ? कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दिल्ली की अपनी रैलियों में नरेंद्र मोदी की नीतियों की आलोचना की क्योंकि वे भी एक राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय नेता हैं। उन्होंने भी श्री केजरीवाल पर झूठे वायदे करने का आरोप लगाया। ये बात अलहदा है कि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को इस लायक भी नहीं समझा कि उस पर कोई टिप्पणी की जाए।

अब दूसरी पारी में केजरीवाल सरकार क्या करेगी इस पर उसका भविष्य निर्भर करेगा। जहां तक बात भाजपा की है तो ये नतीजे उसके लिए धक्का हैं क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद मोदी सरकार ने जिस प्रभावशाली तरीके से अपने घोषणापत्र के मुख्य वायदों को अमली जामा पहिनाया उसके बाद भी राज्यों के चुनाव में पार्टी का निराशाजनक प्रदर्शन शोचनीय है। इसकी वजह प्रादेशिक नेतृत्व को कमजोर करने की कोशिश है या प्रदेश स्तर के नेताओं का केन्द्रीय नेतृत्व पर पूरी तरह आश्रित हो जाना, इसका विश्लेषण होना जरूरी है।

पिछले लगभग दो साल में विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव का विशलेषण करें तो भाजपा को राज्यों में चुनाव को लेकर अपनी रणनीति बदलनी चाहिए। स्थानीय नेतृत्व को आगे रखकर ही चुनाव लड़ना चाहिए। विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी होते हैं, वहीं जनता वर्तमान प्रदेश सरकार के कार्यों के आधार पर ही वोटिंग करती है। भाजपा को स्थानीय व राष्ट्रीय मुद्दों के चुनावी प्रयोग में सावधानी बरतनी होगी। क्योंकि राज्यों में लगातार हार से पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मनोबल तो गिरता ही हैं वहीं एक नकारात्मक संदेश देश की जनता के बीच में भी जाता है। उम्मीद की जानी चाहिए दिल्ली चुनाव में उजागर अपनी कमियों को ध्यान में रखकर भाजपा आगामी रणनीति तय करेगी। आने वाले महीनों में बिहार विधानसभा चुनाव की बड़ी चुनौती उसके सामने है।

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