विचार मित्र

भ्रष्टाचार पर सियासी रार से गरमाई सियासत

बाल मुकुन्द ओझा

राजस्थान एक बार फिर भ्रष्टाचार की जकड़ में है। भ्रष्टाचार पर हल्ला मचने के बावजूद सरकारी कारिंदों पर इसका कोई असर होता नहीं दिख रहा। इस बार परिवहन विभाग में भ्रष्टाचार का बड़ा खुलासा हुआ है। परिवहन विभाग के अधिकारी दलालों के माध्यम से वाहन मालिकों को डरा धमकर मासिक वसूली करते थे। मामले में परिवहन विभाग के आठ अधिकारियों और सात दलालों को पकड़ा गया है। राजस्थान व जयपुर में 17 जगहों पर छापेमारी की गई है। छापेमारी में 1.20 करोड़ की नकदी भी बरामद हुई है। एंटी करप्शन ब्यूरो ने संस्थागत भ्रस्टाचार का भंडाफोड़ कर सियासत को गरमा दिया है। भ्रष्टाचार पर सियासी रार भी शुरू हो गयी है।

विधानसभा में मामले की गूंज होने पर सरकार से जवाब देते नहीं बन पड़ा। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के कई विधायकों ने विभाग में भारी भ्रष्टाचार की बात स्वीकारी है। दूसरी तरफ परिवहन मंत्री प्रताप सिंह ने छापों की कार्यवाही की टाइमिंग को लेकर सवाल उठा दिया। इन छापों को लेकर सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में ही आपसी सिर फुटौव्वल शुरू हो गयी है। परिवहन मंत्री का कहना है भ्रष्टाचार में पकडे गए कई आईएएस , आईपीएस आज भी आन रोल है। वहीँ विपक्ष ने एक पकडे गए एक दलाल के मंत्री से संबंधों को लेका सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। इसके साथ ही भ्रष्टाचार के प्रकरण को लेकर सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की आपसी कलह भी उजागर हो गयी है।
इससे पूर्व भाजपा शासन के दौरान करोड़ों रुपयों के खान महाघूस कांड का भंडाफोड़ हुआ था।

इस कांड के आरोपियों के विरुद्ध अभी तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई। महाघूस कांड में भारतीय प्रशासनिक सेवा के बड़े अधिकारी सहित अनेक अधिकारियों को पकड़ा गया था मगर राजनीतिक पहुँच के कारण ये लोग सलाखों से न केवल बाहर आ गए अपितु शासकीय सेवा में बहाल भी हो गए और आज भी कानून को ठेंगा दिखा रहे है। अब कांग्रेस शासन में एक बड़े भ्रष्टाचार का खुलाशा हुआ है। लगता है राजस्थान भ्रष्टाचार की मंडी का रूप ले चुका है। इंडिया करप्शन सर्वे 2019 में भी राजस्थान को अव्वल बताया गया था।दुनिया के भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली संस्था ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के द इंडिया करप्शन सर्वे 2019 सर्वे में राजस्थान को सबसे भ्रष्ट राज्य में शुमार किया गया था। लाख दावों के बावजूद राजस्थान में भ्रष्टाचार में कहीं कोई कमी नहीं आयी है। पिछली वसुंधरा सरकार में भ्रष्टाचार के बढ़ने का आरोप लगाकर सत्ता में काबिज होने वाली गहलोत सरकार में भी भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है। विभिन्न सर्वे एजेंसियों की रिपोर्टों से तो यही जाहिर हुआ है। इसके बावजूद एसीबी की कार्रवाई का आंकड़ा देखा जाए तो एसीबी भ्रष्टाचार फैलाने वाले लोगों पर बड़े पैमाने पर शिकंजा कस रही है।

राजस्थान में भ्रष्टाचार फैलाने वाले बाबू से लेकर बड़े अधिकारी तक एसीबी की गिरफ्त में आ रहे है। इसी कड़ी में परिवहन विभाग में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार के रैकेट को पकड़ा गया।
राजस्थान में कुछ वर्षों में भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा और राज्य सेवा के अनेक बड़े अधिकारी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकडे गए। इनमें से बहुत से बड़े अधिकारी जेल के सींकचों में बंद रहने के बाद जमानत पर बाहर आकर फिर बहाल हो गए। सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की उनके रुतबे पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है और उनके द्वारा किया गया भ्रष्टाचार सिर्फ शिष्टाचार है।
जिनसे करोड़ों रूपयों की धन राशि बरामद हुई है वे भी जनता को सरेआम ठेंगा दिखा रहे है। इससे यह साफ जाहिर होता है भ्रष्टाचार ने इस राज्य में अपनी जडे मजबूती से जमा ली है। जनता के खून पसीने की कमाई को हड़प करने का जरिया भ्रष्टाचारियों ने अपना लिया है।
यह तो भ्रष्टाचार की एक बानगी है। सच तो यह है कि भ्रष्टाचार ने अपना दामन चहुंओर फैला रखा है। राजस्व, पुलिस, तहसील, कलेक्ट्रेट, जेडीए, स्थानीय निकाय, सिंचाई, जलदाय, रसद, सड़क, पंजीयन जैसे दर्जनों कार्यालय हैं जहां बिना सुविधा शुल्क के कोई काम नहीं होता। ये विभाग सरकार की नाक के नीचे कार्यरत हैं जिसकी जानकारी प्रशासन के सम्पूर्ण अमले तक है मगर भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसे समाप्त करने का साहस या दुस्साहस किसी में नहीं है।
135 करोड़ की आबादी का आधा भारत आज रिश्वतखोरी के मकड़जाल में फंसा हुआ है। भ्रष्टाचार पर सर्वे की विभिन्न रिपोर्टों से यह खुलासा हुआ है। स्थिति यह हो गई है की बिना रिश्वत दिए आप एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। हमारे देश में भ्रष्टाचार इस हद तक फैल चुका है कि इसने समाज की बुनियाद को हिला कर रख दिया है। जब तक मुट्ठी गर्म न की जाए तब तक कोई काम ही नहीं होता।
भ्रष्टाचार एक संचारी बीमारी की भांति इतनी तेजी से फैल रहा है कि लोगों को अपना भविष्य अंधकार से भरा नजर आने लगा है और कहीं कोई भ्रष्टाचार मुक्त समाज की उम्मीद नजर नहीं आरही है। मंत्री से लेकर संतरी और नेताओं तक पर भ्रस्टाचार के दलदल में फंसे है। हालात इतने बदतर हैं कि निजी क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। सिविल सोसाइटी और मीडिया के दवाब में सरकारी एजेंसियां भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को अंजाम तो दे रही हैं मगर उनकी गति बेहद धीमी है।
भारत में स्कूल, अस्पताल, पुलिस, पहचान पत्र और जनोपयोगी सुविधाओं के मामले में फोर्ब्स के एक सर्वे में भाग लेने वाले लगभग आधे लोगों ने कहा कि उन्होंने कभी न कभी रिश्वत दी है। 53 प्रतिशत लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि 63 प्रतिशत मानते हैं कि आम लोगों पर उनके प्रयासों से कोई असर नहीं पड़ेगा।

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