धर्म - अध्यात्म

सावन में शिव की ही अराधना क्यों

शास्त्रों में कहा गया है कि सावन भगवान शिव का महीना होता है, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इस महीने में भगवान विष्णु पाताल लोक में रहते हैं, इसी वजह से इस महीने में भगवान शिव ही पालनकर्ता होते हैं और वही भगवान विष्णु के भी काम को देखते हैं यानी सावन के महीने में त्रिदेव की सारी शक्तियां भगवान शिव के पास होती हैं।

शिव को देवों का देव महादेव कहा जाता है। वेदों में इन्हें रूद्र नाम से पुकारा गया है। सावन में शिवलिंग की पूजा की जाती है, चूंकि लिंग सृृष्टि का आधार है और शिव विश्व कल्याण के देवता हैं। शिवलिंग से दक्षिण दिशा में ही बैठकर पूजन करने से मनोकामना पूर्ण होती है। शिवलिंग पूजा में दक्षिण दिशा में बैठकर भक्त को भस्म का त्रिपुंड लगाना चाहिए, रूद्राक्ष की माला पहननी चाहिए और बिना कटेफटे बिल्वपत्र अर्पित करना चाहिए। शिवलिंग की कभी पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। आधी परिक्रमा करना ही शुभ माना गया है।

शिव आराधना का वैज्ञानिक पहलू

शिव ब्रह्मांड की शक्ति के द्योतक हैं। शिवलिंग काले पत्थर का ही होता है, जो वातावरण व ब्रह्मांड से ऊर्जा अवशोषित करता रहता है। इस ऊर्जा को पूर्ण रूप से शिवलिंग में समाहित करने के लिए इसको साफ -सुथरा रखने व जल, दूध आदि से अभिषेक करने की प्रथा है, जिससे पूजा अर्चना के समय आप को उपयुक्त ऊर्जा प्राप्त हो और प्रदूषित ऊर्जा समाप्त हो जाए। सावन ऐसा महीना होता है, जब बरसात के मौसम का एक माह से ज्यादा समय गुजर चुका होता है, उसके बाद मौसम में नमी व काफी सुहावनापन आ जाता है।

बरसात के मौसम में शुरू के एक महीने में वातावरण में मौजूद विषाक्त गैसें धरती पर पानी के कणों के साथ आ जाती हैं और अक्सर स्त्रियों व बच्चों में त्वचा संबंधी रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इन रोगों को दूर करने हेतु ही सावन में स्त्रियों द्वारा शिवलिंग पर जल, दूध, घी, शहद आदि से अभिषेक किया जाता है, जिससे त्वचा रोग के जर्म भी शिवलिंग में अवशोषित होकर शरीर के वैक्टीरिया समाप्त हो जाते हैं और काया निरोगी होती है। साथ ही शिवलिंग से अच्छी ऊर्जा भी मिलती है।

सावन के महीने में शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना से दांपत्य जीवन में प्रेम और तालमेल बढ़ता है। संपूर्ण वातावरण में पेड़-पौधों, खेतों, झाडिय़ों व गार्डेन आदि में हरियाली आ जाती है, जिससे मनुष्यमात्र ही नहीं, वरन जीव-जंतुओं में भी प्रसन्नता बढ़ती है। औरतें समूह में झूला झूलती हैं और आपस में गायन करती हैं, जिससे उनमें प्रसन्नता बढ़ती है।

पूजा-अर्चना का विधान

दूध से शिव का अभिषेक करने से परिवार में कलह, मानसिक अवसाद व अनचाहे दुख-कष्ट का निवारण होता है। वंशवृद्धि के लिए घी की धारा डालते हुए शिव सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। इत्र की धारा डालते हुए शिव का अभिषेक करने से भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। जलधार डालते हुए शिव का अभिषेक करने से मानसिक शांति मिलती है। शहद की धार डालते हुए अभिषेक करने से रोग मुक्ति मिलती है। परिवार में बीमारियों का प्रकोप नहीं रहता है। गन्ने के रस की धार डालते हुए अभिषेक करने से आर्थिक समृद्धि व परिवार में सुखद माहौल बना रहता है।

शिव को गंगा की धार बहुत प्रिय है। गंगा जल से अभिषेक करने पर पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। अभिषेक करते समय महामृत्युंजय का जाप करने से फल की प्राप्ति कई गुना अधिक हो जाती है। ऐसा करने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। सरसों के तेल की धार डालते हुए अभिषेक करने से शत्रुओं का शमन होता है, रुके हुए काम बनने लगते हैं और मान-सम्मान मेंं वृद्धि होती है।

इसी तरह बिल्वपत्र चढ़ाने से रोग से मुक्ति मिलती है। कमल पुष्प चढ़ाने से शांति व धन की प्राप्ति होती है। कुश चढ़ाने से मुक्ति की प्राप्ति होती है। दूर्वा चढ़ाने से आयु में वृद्धि होती है। धतूरा अर्पित करने से पुत्र का सुख मिलता है। कनेर का पुष्प चढ़ाने से परिवार में कलह व रोग से निवृत्ति मिलती है। शमी पत्र चढ़ाने से शत्रुओं का शमन व प्रेतबाधा से मुक्ति मिलती है।

पूजा में वर्जित
कुंवारी लड़कियों को शिवलिंग पर जल नहीं चढ़ाना चाहिए। शिवलिंग पर कभी केतकी के फूल अर्पित नहीं करने चाहिए, क्योंकि ब्रह्मदेव के झूठ में उनका साथ देने की वजह से शिव ने केतकी के फूलों को श्राप दिया था। तुलसी पत्तों को शिवलिंग पर नहीं चढऩा चाहिए, क्योंकि शिव द्वारा तुलसी के पति जरासंध का वध हुआ था। नारियल तो ठीक है, लेकिन शिवलिंग पर नारियल के पानी से अभिषेक नहीं करना चाहिए। हल्दी का संबंध स्त्री सुंदरता से है, इसलिए शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ानी चाहिए। शिव विनाशक हैं और सिंदूर जीवन का संकेत। इस वजह से शिव पूजा में सिंदूर का उपयोग नहीं होता।

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