इसे अज्ञानता कहें या झूठ की पराकाष्ठा?

निर्मल रानी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने गत् पांच वर्ष के शासनकाल में पचास से अधिक बार अपने पसंदीदा कार्यक्रम मन की बात के माध्यम से देश की जनता को संबोधित कर चुके हैं। उनके इस एकतरफा संवाद को प्रचारित करने के लिए शुरू से ही देश के छात्रों को ही लक्ष्य बनाया जाता रहा है। प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम की शुरुआत प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद सर्वप्रथम 3 अक्तूबर 2014 को विजयदशमी के दिन से की थी। मन की बात का एक एपिसोड जो 27 जनवरी 2015 को प्रसारित किया गया जिसमें अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी शिरकत की थी। सवाल यह है कि जो प्रधानमंत्री देश के छात्रों को संबोधित करने तथा उनसे एकतरफा संवाद करने का इतना शौक़ रखते हैं क्या उन्हें स्वयं इतना ज्ञान है कि वे देश के छात्रों का ज्ञानवर्धन कर सकें? गत् पांच वर्षों में उन्होंने अपने मुखारविंद से झूठ, दर झूठ और महाझूठ को जिस प्रकार पूरे देश व दुनिया में फैलाने की कोशिश की है उससे यकीनन देश की खूब जगहंसाई हुई है। भले ही मोदी भक्त अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की कहावत को चरितार्थ करते हुए उनमें विष्णु का अवतार क्यों न देखते हों, उन्हें देश का अब तक का सबसे मज़बूत या सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री क्यों न बताते हों परंतु यदि उन्हीं भक्तों की आंखों पर चढ़ा ‘भक्ति’ का चश्मा उतार दिया जाए तो उन्हें भी साफ नज़र आने लगेगा कि प्रधानमंत्री की अनेक बातें ऐसी हुआ करती हैं जिनकी तुलना शेख़ चेहली के लतीफों से भी नहीं की जा सकती।

निश्चित रूप से नेताओं का झूठ से चोली-दामन का रिश्ता है। भारतीय नेता झूठे वादों व आश्वासनों के लिए पूरे देश में जाने जाते हैं। परंतु प्रधानमंत्री स्तर के किसी नेता द्वारा तथ्यात्मक गल्तियां बार-बार करना, विज्ञान द्वारा प्रमाणित तथ्यों को अपने गढ़े हुए झूठ से नकारना, इतिहास को गलत ढंग से पेश करना, प्रमाणित सत्य पर काले झूठ की परत चढ़ाना भारतवर्ष में पहली बार देखा जा रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि वे अपने झूठ व महाझूठ को इतने आत्मविश्वास के साथ जनसभाओं या साक्षात्कारों में बोलते हैं जितनी ढिटाई के साथ देश का कोई साधारण व्यक्ति भी नहीं बोल सकता। प्रधानमंत्री की गलतबयानी व उनके द्वारा अब तक बोले गए सैकड़ों झूठ के अनेक क़िस्से मीडिया के माध्यम से पूरे विश्व को पता लग चुके हैं। कभी वे बिहार की जनता का दिल जीतने के लिए उन्हें झूठा इतिहास बताते हुए यह फ़रमाते हैं कि ‘सिकंदर महान को बिहार में गंगा नदी के तट पर बिहारियों ने पराजित किया था’। जबकि सिकंदर पश्चिम दिशा से भारत में दाखिल हुआ और राजा पुरु से युद्ध करते हुए व्यास नदी तक पहुंचा। उसे पंजाब से ही वापस लौटना पड़ा। कभी मोदी तक्षशिला, जोकि इस समय पाकिस्तान में स्थित है को बिहार का तक्षशिला बता बैठते हैं। कभी श्यामाप्रसाद मुखर्जी जो कोलकता में जन्मे थे उन्हें गुजरात का बेटा बता डालते हैं तो कभी तीन अलग-अलग कालखंडों में पैदा हुए महापुरुषों, संत कबीर,गुरू गोरक्षनाथ तथा गुरू नानक देव की एक साथ बैठक करा देते हैं। उन्होंने अपने गुजरात के मु यमंत्रित्व काल से लेकर अब तक ऐसे सैकड़ों झूठ देश की जनता के बीच परोसे हैं।


परंतु पिछले दिनों उनके मुंह से उनके साक्षात्कार के दौरान कुछ ऐसी बातें निकलीं जो न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गलत हैं बल्कि ऐसी प्रतीत होती हैं जिन्हें सुनकर वास्तव में झूठ भी शर्मसार हो जाए। इतना ही नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की इस तरह की बेसिर-पैर की बातें देश के उन छात्रों को भी दिशा भ्रमित कर सकती हैं जिन्हें ‘मन की बातÓ सुनाने में वे विश्वास करते हैं। देश का प्रधानमंत्री वास्तव में पूरे देश के लिए एक आदर्श पुरुष के समान होता है। उसके मुंह से निकला हुआ एक-एक शब्द देशवासियों का प्रतिनिधित्व करता है। परंतु सर्वोच्च पद पर बैठा हुआ व्यक्ति जब यह कहने लगे कि-‘बादलों के पीछे विमान के छुपने से वह रडार से बच जाता है तो वास्तव में यह जग हंसाई कराने के सिवा और कुछ नहीं है। दुनिया के छात्रों को विज्ञान के पाठ्यक्रम में अब तक यही पढ़ाया जाता रहा है कि रडार की सूक्ष्म तरंगें सभी प्रकार की बाधाओं को चीर कर किसी भी लक्ष्य से टकरा कर तरंगों के परावर्तन के सिद्धांत के अनुसार वापस आकर किसी भी लक्ष्य की सूचना देती हैं। परंतु प्रधानमंत्री ने केवल अपनी हेकड़ी जमाने के लिए बालाकोट एयर स्ट्राईक के संदर्भ में यह कह डाला कि ‘बादलों की ओट में हमारे विमान पाकिस्तानी राडारों से बच सकते हैंÓ। क्या प्रधानमंत्री का इस प्रकार का अज्ञान, विज्ञान के छात्रों के मन में इस बात की जिज्ञासा पैदा नहीं करेगा कि जब भारत जैसे महान देश का ‘महान’ प्रधानमंत्री यह कह रहा है कि बादलों में छुपकर विमान राडार की ज़द में नहीं आते तो यह बात इसलिए सही हो सकती है क्योंकि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि देश का प्रधानमंत्री बोल रहा है?


इसी प्रकार एक दूसरा सफेद झूठ डिजिटल कैमरा व ई-मेल को लेकर प्रधानमंत्री द्वारा अपने एक साक्षात्कार में बोला गया। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं सर्वप्रथम 1987-88 में डिजिटल कैमरे द्वारा भाजपा नेता लालकृष्ण अडवाणी की फोटो खींची तथा उसे ईमेल के माध्यम से दिल्ली भेजा। और यह चित्र अगले दिन अखबारों में प्रकाशित हुआ। उन्होंने यह कहकर भी अपनी हेकड़ी दिखाई कि संभवत:- ‘मैं देश का पहला व्यक्ति था जिसने डिजिटल कैमरे का उपयोग 1987-88 में किया और ई-मेल के माध्यम से अडवाणी जी की फोटो दिल्ली स्थानांतरित की जो अगले ही दिन प्रकाशित हुई और इस रंगीन चित्र को देखकर अडवाणी जी बड़े आश्चर्यचकित हुए’। प्रधानमंत्री के इस कथन के बाद दो तरह के सवाल देश के लोगों द्वारा पूछे जा रहे हैं। उनके आलोचक तथा उनकी हर बात पर पैनी नज़र रखने वाले लोग यह पूछ रहे हैं कि एक ओर तो आप स्वयं को इतना गरीब बताते हैं कि आप अपनी जेब में बटुआ इसलिए नहीं रखते थे कि बटुए में रखने के लिए आपके पास पैसे नहीं होते थे तो दूसरी ओर आपने सबसे पहले डिजिटल कैमरा भी रखा और ईमेल जैसी अति आधुनिक संचार व्यवस्था का उपयोग भी किया? यह दोनों विरोधाभासी बातें आखर किस निष्कर्ष पर पहुंचाती हैं? दूसरा सवाल यह पूछा जा रहा है कि भारत में ई-मेल व्यवस्था की शुरुआत 1990 के बाद हुई जो आम लोगों तक 1995 तक पहुंची। ऐसे में मोदी को 1987 में ही ई-मेल की सुविधा आखिर कहां से प्राप्त हुई?
इस प्रकार की उल-जूलल, गैर जि़ मेदाराना, तथ्यहीन तथा विज्ञान व इतिहास को नकारने वाली तमाम बातें नरेंद्र मोदी अपने राजनैतिक जीवनकाल में करते आ रहे हैं। और देश का दुर्भाग्यय है कि इस प्रकार की बातें करने वाले व्यक्ति को देश ने न केवल लंबे समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर बिठाए रखा बल्कि इसी तरह की झूठ व लंतरानी हांकते हुए वे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक भी पहुंच गए। पिछले दिनों करण थापर द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा से एक इंटरव्यू के दौरान पूछा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार आपको अपना घनिष्ठ मित्र बताते हैं, आपका इस विषय पर क्या कहना है। इस पर ओबामा ने जवाब दिया कि वे भारत में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डा० मनमोहन सिंह को जानते हैं तथा वे उनका बेहद स मान करते हैं। इतना ही नहीं बल्कि इस प्रश्र के उत्तर में ओबामा ने मनमोहन सिंह की नीतियों की भी प्रशंसा की। ओबामा ने अपने उत्तर में मोदी का नाम तक नहीं लिया। इस प्रकार के जवाब तभी सुनने को मिलते हैं जब किसी को गंभीरता से नहीं लिया जाता या उसपर तवज्जो नहीं दी जाती। पूरे देश को सोचना चाहिए कि आखिर देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा झूठ, फरेब, अज्ञानता तथा तथ्यहीन बातों को परोसने का सिलसिला आख़िर कब तक जारी रहेगा?

यह लेखक के विचार हैं। तरुणमित्र सहमति आवश्यक नही है।

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