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सूबे की बेसिक शिक्षा…बेबस सिस्टम!

जूता-मोजा, स्वेटर-बैग वितरण से लेकर मिड-डे-मील जैसी योजनाओं में दिखीं खामियां

योगी सरकार के पहले मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान ही अनुपमा जायसवाल को हटाया गया

फिर डॉ. सतीश को सौंपी गई बेसिक शिक्षा की कमान, अब डीजी के नये पद का फॉर्मूला

लखनऊ। योगी सरकार के पांच साल के कार्यकाल का अभी आधा समय ही बीता था कि प्रदेश की बेसिक शिक्षा का पूरा सिस्टम बेपटरी होता दिखा। बीजेपी जानकारों की मानें तो अनियमित कार्य प्रणाली के चलते पहले योगी कैबिनेट से अनुपमा जायसवाल को हटाया गया…उनकी जगह डॉ. सतीश द्विवेदी को बेसिक शिक्षा का मंत्रालय सौंपा गया…और अब प्रदेश सरकार ने अप्रत्याशित निर्णय के तहत पहली बार सूबे के इस वृहद शिक्षा विभाग में महानिदेशक (डीजी) का पद सृजित किया है, जो बेसिक शिक्षा विभाग का सबसे उच्च प्रशासनिक मुखिया होगा। तर्क दिया जा रहा है कि इससे बेसिक शिक्षा के ढुलमुल प्रशासनिक तंत्र में ऊपर से लेकर नीचे तक कसावट पैदा होगी…प्राइमरी स्कूलों से जुड़ी योजनायें सही ढंग से चलेंगी और इसका पूरा लाभ स्कूली बच्चों को मिल सकेगा।

ऐसे में देखने वाली बात यह कि क्या…मंत्रियों की अदला-बदली और टॉप ब्यूरोके्रसी सिस्टम में यकायक नये पद की संरचना भर कर देने से…प्रदेश में बदहाल पटरी पर चलता जा रहा बेसिक शिक्षा विभाग सही टैक पर आ पायेगा। योगी सरकार के इस डीजी वाले फॉर्मूेले पर सवाल उठाते हुए कुछ जानकारों का तो यह भी कहना है कि शिक्षा के समकक्ष ही हेल्थ विभाग का भी एरिया उतना ही व्यापक है और यहां पर पहले से ही डीजी पोस्ट अस्तित्व में है…तो क्या हेल्थ सेक्टर में जरूरी सुधार हो पाया…इस दिशा में कुछ हुआ तो फिर क्यों सिद्धार्थ नाथ सिंह को मंत्री पद से हटाकर उन्हें कम महत्व का विभाग एलॉट कर दिया गया। अब आनन-फानन में केवल डीजी पोस्ट बढ़ा देने से अकेले पूरे बेसिक शिक्षा के बेबस से दिखने वाले सिस्टम को चुस्त-दुरूस्त किया जा सकेगा…विभाग की रीढ़ माने जाने वाले बीएसए अपने जिम्मेदारियों का सही ढंग से निर्वहन करेंगे…यह एक बड़ा सवाल प्रदेश के शिक्षाविदों के मन-मस्तिष्क में कौंध रहा है।

वहीं बेसिक शिक्षा की हालिया बदहाली पर गौर करें तो अभी कुछ ही दिन पहले पूर्वांचल के एक जिले में स्कूली बच्चों के मिड-डे-मील में दिखीं खामियों से लेकर नौनिहालों के बीच जूता, मोजा, बैग व स्वेटर वितरण की दीर्घकालिक व्यवस्था में कहीं न कहीं अनियमिततायें देखने को मिलीं। आलम यह रहा कि इस भ्रष्टता की आंच का ताप योगी सरकार के ऊपर पड़ने लगा और फिर विपक्षी दल भी सूबे में बदहाल बेसिक शिक्षा व्यवस्था को रह-रहकर सवाल खड़ा करने लगे। शासन से जुडे उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो उस दौरान योगी कैबिनेट में तत्कालीन बेसिक शिक्षा मंत्री अनुपमा जायसवाल की कार्य प्रणाली को लेकर सरकार में ही नहीं बल्कि प्रदेश भाजपा व पार्टी संगठन में भी तमाम प्रकार के शिकायतों की फेहरिस्त लग गई। कई बार तो यह भी सुनने में आया कि कुछ जनपदों के प्राइमरी स्कूलों में स्वेटर व जूता आदि वितरण प्रणाली में कुछ खामियों को लेकर जब बीजेपी के ही कुछ विधायकों ने कैबिनेट मंत्री से मुलाकात करनी चाही तो उन्हें समय ही नहीं दिया गया।

इसके बाद तो बेसिक शिक्षा की खामियों को लेकर योगी सरकार फौरन एक्शन मोड में आयी। दिल्ली से लौटने के बाद अपने पहले मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान ही योगी सरकार ने अनुपमा जायसवाल को सीधे कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाया और युवा नेता डॉ. सतीश पर भरोसा जताया। वैसे गौर हो कि बेसिक शिक्षा ऐसे बडे विभागों में शुमार है, जिसमें केंद्र व राज्य सरकार दोनों की कहीं न कहीं और किसी न किसी रूप में सहभागिता रहती है। यही नहीं आमजन से सीधे तौर पर जुड़ा यह विभाग किसी भी सरकार की इमेज को ‘डाउन’ या फिर ‘अप’ करने की भी क्षमता रखता है। नतीजतन बेसिक शिक्षा को लेकर केंद्र से लेकर राज्यों की प्रत्येक सरकार खासा संजीदा रहती है।

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