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एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर अयोध्‍या केस, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने दाखिल की रिव्यू पिटीशन

अयोध्या जमीन विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा के लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद (JUH) ने अर्जी लगा दी है. मूल पक्षकार मोहम्‍मद सिद्दीकी के कानूनी उत्‍तराधिकारी मौलाना सैयद अशाद रशीदी की ओर से पुनर्विचार याचिका लगाई गई है.

याचिका में कहा गया है, “सुप्रीम कोर्ट ने 1934, 1949 और 1992 में मुस्लिम समुदाय के साथ हुई नाइंसाफी को गैरकानूनी करार दिया लेकिन उसे नजरअंदाज भी कर दिया. इस मामले में पूर्ण न्याय तभी होता जब मस्जिद का पुनर्निर्माण होता. विवादित ढांचा हमेशा ही मस्जिद था और उस पर मुसलमानों का एकाधिकार रहा है.”

याचिका में कहा गया कि कोर्ट ने माना है कि वहां नमाज होती थी, फिर भी मुसलमानों को बाहर कर दिया. याचिका में कहा गया है कि 1949 में अवैध तरीके से इमारत में मूर्ति रखी गई, फिर भी रामलला को पूरी जगह दी गई. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड दो-तीन दिन बाद पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगा.

JUH ने कहा था कि वे मस्जिद के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि स्वीकार नहीं करेंगे. वह अयोध्या मामले में एक प्रमुख मुस्लिम वादी है. मौलाना अरशद मदनी ने कुछ दिन पहले कहा था कि कोई भी मुस्लिम किसी मस्जिद को उसकी मूल जगह से कहीं और स्थानांतरित नहीं कर सकता. इसलिए मस्जिद के लिए कहीं और जमीन स्वीकार करने का सवाल ही पैदा नहीं होता. अपने बयान में मदनी ने यह भी कहा था कि अगर मस्जिद को नहीं तोड़ा गया होता तभी भी क्या कोर्ट मस्जिद तोड़कर मंदिर बनाने का फैसला सुनाता.

क्‍या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने 9 नवंबर को सर्वसम्मति से ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. निर्मोही अखाड़े के दावे को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड को ही पक्षकार माना था. कोर्ट ने साथ में यह भी आदेश दिया था कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ जमीन दी जाए. कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने में ट्रस्ट बनाए. इस ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को भी प्रतिनिधित्व देने को कहा है.

क्‍या है जमीयत उलेमा-ए-हिंद?

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की स्थापना 1919 में हुई थी. यह प्रभावशाली और आर्थिक रूप से मजबूत मुस्लिम संगठनों में से एक है. संगठन ने खिलाफत आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई थी. वहीं संगठन ने विभाजन का भी विरोध किया था.

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