विचार मित्र

सामाजिक समता के महादूत

निरंकार सिंह

राजा राममोहन राय देश के उन महान समाज सुधार में से एक हैं जिन्हें आधुनिक भारत और भारतीय पुनर्जागरण का जनक कहा जाता है। भारतीय सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में उनका विशिष्ट स्थान है। वे ब्रह्म समाज के संस्थापक, भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे।

उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और पत्रकारिता के कुशल संयोग से दोनों क्षेत्रों को गति प्रदान की। उनके आन्दोलनों ने जहाँ पत्रकारिता को चमक दी, वहीं उनकी पत्रकारिता ने आन्दोलनों को सही दिशा दिखाने का कार्य किया। हिन्दी, के प्रति उनका अगाध स्नेह था। वे रूढ़िवाद और कुरीतियों के विरोधी थे लेकिन संस्कार, परंपरा और राष्ट्र गौरव उनके दिल के करीब थे। वे स्वतंत्रता चाहते थे लेकिन चाहते थे कि इस देश के नागरिक उसकी कीमत पहचानें।

उन्होंने अपना जीवन जातिवाद का विरोध करके समानता लाने के लिए, अंधविश्वासों का विरोध विज्ञान के लिए, अधिनायकवाद का विरोध स्वतंत्रता के लिए और अंधविश्वासों के धर्म के स्थान पर सत्य के धर्म को लाने में किया। यदि हम सत्य के इस धर्म को, विश्व प्रेम के सत्य को पुनः स्वीकार कर लें तो हम अपने छोटे-छोटे मतभेदों को भुला सकेंगे। अपने झगड़ों को भुला सकेंगे जिनमें हम अपना जीवन गवां देते हैं। धर्मान्धता और झगड़े अपनी शक्ति के महत्व खो देंगे। एक सच्चा धार्मिक व्यक्ति यदि वह सचमुच धार्मिक है तो वह अनुभव करेगा कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी गरिमा है और उसमें परमात्मा का ही अंश है। प्रत्येक उस निराकार ब्रह्म का एक अंश है।

राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 ई. को राधा नगर नामक बंगाल के एक गांव में, सम्पन्न बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता रमाकांत वैष्णव धर्म के थे जबकि उनकी माता तारिनि देवी शिवैत परिवार से थी। राममोहन ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गांव की पाठशाला से ही ग्रहण की और वहाँ उन्होंने बंगाली , संस्कृत और पर्शियन भाषा का भी अध्ययन लिया। बाद में मदरसा में उन्होंने पर्शियन अरेबिक भाषा का अध्ययन किया। बाद में हिन्दू साहित्य और संस्कृत का अध्ययन करने वे बनारस गये।

वहाँ उन्होंने वेद और उपनिषद का भी अध्ययन किया। कहा जाता है कि 9 साल की आयु में उन्हें पटना भेजा गया था और 2 साल बाद उन्हें बनारस भेजा गया था। उन्होंने अपने जीवन में अरबी, फारसी, अंग्रेजी, ग्रीक, हिब्रू आदि भाषाओं का अध्ययन किया था। हिन्दू, ईसाई, इस्लाम और सूफी धर्म का भी उन्होंने गंभीर  अध्ययन किया था। 17 वर्ष की अल्पायु में ही वे मूर्ति पूजा विरोधी हो गये थे। वे अंग्रेजी भाषा और सभ्यता से काफी प्रभावित थे।

उन्होंने इंग्लैंड की यात्रा की। धर्म और समाज सुधार उनका मुख्य लक्ष्य था। वे ईश्वर की एकता में विश्वास करते थे और सभी प्रकार के धार्मिक अंधविश्वास और कर्मकांडों के विरोधी थे। अपने विचारों को उन्होंने लेखों और पुस्तकों में प्रकाशित करवाया। किन्तु हिन्दू और ईसाई प्रचारकों से उनका काफी संघर्ष हुआ। परन्तु वे जीवन भर अपने विचारों का समर्थन करते रहे और उनके प्रचार के लिए उन्होंने ब्रम्ह समाज की स्थापना की। राजा राममोहन राय ने आंदोलन करके सती प्रथा को गैरकानूनी दण्डनीय अपराध घोषित करवाया।

राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी छोड़कर अपने आपको राष्ट्र सेवा में झोंक दिया। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के अलावा वे दोहरी लड़ाई लड़ रहे थे। दूसरी लड़ाई उनकी अपने ही देश के नागरिकों से थी। जो अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े थे। राजा राममोहन राय ने उन्हें झकझोरने का काम किया। बाल-विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का उन्होंने भरपूर विरोध किया। धर्म प्रचार के क्षेत्र में अलेक्जेंडर डफ्फ ने उनकी काफी सहायता की। देवेंद्र नाथ टैगोर उनके सबसे प्रमुख अनुयायी थे। वह भी अंग्रेजी, आधुनिक चिकित्सा प्रौद्योगिकी और विज्ञान के अध्ययन को लोकप्रिय भारतीय समाज में विभिन्न बदलाव की वकालत की।

जब इस देश में दलितों और हमारी नारियों पर अनेक प्रतिबंध लगे थे तो राजा राममोहन राय ने विरोध की आवाज उठायी और कहा कि जो देश अपने को सभ्य कहता है उसे समानता के मूल सिद्धांत को स्वीकार कर लेना चाहिए – मानव मात्र की समानता। जब तक कुछ लोगों से निम्नता का व्यवहार किया जायेगा और कुछ लोगों से उच्चता का, तब तक आप वास्तव में सभ्य नहीं हैं। समानता का यह सिद्धांत हमारे धर्म की आरम्भिक अवस्था में भी था।

प्राचीन काल में नारियों को वे सभी विशेष अधिकार मिले हुए थे जो पुरूष को हैं। पर सदियां बीत गयीं और समानता का यह सिद्धांत कहीं छूट गया। फलतः हमें हानि उठानी पड़ी। यदि यह देश पतन और पराधीनता के दौर से गुजरा है तो वह इसलिए कि हम जिन सिद्धांतों के उपदेश देते थे, उनमें निष्ठा खो बैठे। इस देश ने जो-जो हानियां और पराधीनता झेली है, उसके बारे में हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। यदि हम इन सबसे छुटकारा चाहते हैं तो हमें प्रतिबंधों को हटाना होगा। व्यवहार में स्त्री-पुरूषों, दलितों और विशेष व्यक्तियों सभी को पूर्ण समानता प्रदान की जाए।

उन्होंने 1814 में आत्मीय सभा का गठन कर समाज में सामाजिक और धार्मिक सुधार शुरू करने का प्रयास किया। उन्होंने महिलाओं के फिर से शादी करने, संपत्ति में हक समेत महिला अधिकारों के लिए अभियान चलाया। उन्होंने सती प्रथा और बहुविवाह का जोरदार विरोध किया।उन दिनों काफी पिछड़ापन था और संस्कृति के नाम पर लोग अपनी जड़ों की ओर देखते थे, जबकि राजा राममोहन राय यूरोप के प्रगतिशील एवं आधुनिक विचारों से प्रभावित थे।

उन्होंने इस नब्ज को समझा और जड़ को ध्यान में रखकर वेदांत को नया अर्थ देने की चेष्टा की।राजा राममोहन राय ने शिक्षा खासकर स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया। उन्होंने अंग्रेजी, विज्ञान, पश्चिमी चिकित्सा एवं प्रौद्योगिकी के अध्ययन पर बल दिया। वे मानते थे कि अंग्रेजी शिक्षा पारंपरिक शिक्षा प्रणाली से बेहतर है।उन्होंने 1822 में अंग्रेजी शिक्षा पर आधारित स्कूल की स्थापना की।

धार्मिक और सामाजिक विकास के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का नाम सबसे अग्रणी है। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और पत्रकारिता के कुशल संयोग से दोनों क्षेत्रों को गति प्रदान की। राजा राममोहन राय ने तत्कालीन भारतीय समाज की कट्टरता, रूढ़िवादिता एवं अंधविश्वासों को दूर करके उसे आधुनिक बनाने का प्रयास किया। उनकी दूरदर्शिता और वैचारिकता के सैकड़ों उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं।

उन्होंने समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिए भी कड़ा संघर्ष किया था। उन्होंने स्वयं एक बंगाली पत्रिका ‘सम्वाद-कौमुदी’ आरम्भ की और उसका सम्पादन भी किया। यह पत्रिका भारतीयों द्वारा सम्पादित सबसे पुरानी पत्रिकाओं में से थी।

राजा राममोहन राय ने ब्रह्ममैनिकल मैगजीन, संवाद कौमुदी, मिरात-उल-अखबार ,(एकेश्वरवाद का उपहार) बंगदूत जैसे स्तरीय पत्रों का संपादन-प्रकाशन किया। बंगदूत एक अनोखा पत्र था। इसमें बांग्ला, हिन्दी और फारसी भाषा का प्रयोग एक साथ किया जाता था। उनके जुझारू और सशक्त व्यक्तित्व का इस बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि सन् 1821 में अँग्रेज जज द्वारा एक भारतीय प्रतापनारायण दास को कोड़े लगाने की सजा दी गई। फलस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई। इस बर्बरता के खिलाफ राय ने एक लेख लिखा।

1831 में एक विशेष कार्य के सम्बन्ध में दिल्ली के मुगल सम्राट के पक्ष का समर्थन करने के लिए वे इंग्लैंड गये। वह उसी कार्य में व्यस्त थे कि ब्रिस्टल में 27 सितम्बर 1883 को उनका देहान्त हो गया। उन्हें मुगल सम्राट की ओर से ‘राजा’ की उपाधि दी गयी।
इसमें कोई संदेह नहीं कि वे महान आदर्श जो राजा राममोहन राय हमें देना चाहते थे-सत्य का धर्म, सामाजिक समानता, मानव मात्र की एकता-आज भी हमसे दूर है।

हम अभी तक इन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाये हैं। इस प्रकार जो संदेश राजा राममोहन राय ने हमें दिया वह संदेश आज भी महत्व रखता हैै क्योंकि जिन आदर्शो के लिए वे जिए-मरे अब भी प्राप्त नहीं हुए। उन आदर्शो को हममें से प्रत्येक को कार्यान्वित करना होगा। निःसंदेह, उन्हें यातनाएं दी गई और सताया गया। सभी महान व्यक्तियों के साथ ऐसा ही होता है। विश्व का निर्माण उन व्यक्तियों द्वारा हुआ है जिनका सबसे अधिक विरोध हुआ है। यही लोग विश्व में परिवर्तन लाते हैं।

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