विचार मित्र

शव में तब्दील होती भारत की जनता

हरिगोविंद विश्वकर्मा

पार्थिव जनता। जी हां, पार्थिव केवल मानव शरीर नहीं होता, बल्कि कभी-कभी पार्थिव जनता भी हो जाती है। पार्थिव जनता का मतलब शव में तब्दील हो चुकी जनता। शव के साथ चाहे जैसा व्यवहार कीजिए। उसे डंडे से पीटिए, उसे गोली ही मार दीजिए या फिर उसे चाकू से बोटी-बोटी कर दीजिए। वह कोई भी रिएक्शन नहीं देगा। वह न तो चिल्लाएगा, न ही रहम की भीख मांगेगा, क्योंकि वह शव है। उसमें जान ही नहीं बची है। उसमें कोई संवेदना ही नहीं बची है। इसलिए उसके साथ चाहे जितना जुल्म कर लीजिए, वह उफ् तक नहीं करेगा। कहने का मतलब अगर आदमी का शरीर शव में तब्दील नहीं हुआ है, तो कष्ट देने वाली बातों का विरोध करेगा, मसलन वह चिल्लाएगा, लेकिन अगर वह शव में तब्दील हो गया है तो वह कुछ बोलेगा ही नहीं। आप चाहे जा करें।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की जनता का आजकल यही हाल है। कांग्रेस ने अपने शासन काल में जनता को वैश्विकरण, उदारीकरण, निजीकरण और कॉन्ट्रैक्ट लेबर सिस्टम का टेबलेट देकर गंभीर बीमार और पंगु कर दिया था। तब जनता केवल पंगु हुई थी, शव में तब्दील नहीं हुई थी। लिहाज़ा, कभी-कभार सरकार का विरोध भी करती थी। विरोध करते हुए जनता ने 2014 में देश की बाग़डोर कांग्रेस से छीन कर देशभक्त पार्टी के हवाले कर दिया। मगर देशभक्त सरकार ने देश की पंगु जनता को कोमा में डालकर उसकी विरोध करने की क्षमता ही ख़त्म कर दी।

रही-सही कसर चीन के वुहान से निकले कोरोना वायरस की महामारी ने पूरी कर दी। कोविड 19 ने जनता को ही शव में बदल दिया। देशभक्त सरकार शव में तब्दील हो चुकी इस जनता के साथ अपने अनुसार व्यवहार कर रही है। वह जनता की कुटाई कर रही है। परंतु शव में तब्दील हो चुकी जनता है कि कुछ रिएक्ट ही नहीं कर रही है। यही वजह है कि पिछले एक पखवारे से अधिक समय से पेट्रोल और डीज़ल के दाम रोज़ाना बढ़ रहे हैं। इस दौरान प्रति लीटर पेट्रोल लगभग दस रुपए और डीज़ल ग्यारह रुपए की बढ़ोतरी हो चुकी है, लेकिन जनता का कोई रिएक्शन देखने को नहीं मिल रहा है।

पहले जहां पेट्रोल और डीज़ल के दाम कुछ पैसे बढ़ा देने से देश में भारी विरोध शुरू हो जाता था। लोग सड़क पर आ जाते थे, आंदोलन करने लगते थे। इससे कभी-कभी सरकार को अपना फ़ैसला वापस लेना पड़ता था। वहीं आज पूरे देश में पेट्रोल और डीज़ल के दाम में रोज़ाना हो रही वृद्धि का कोई विरोध नहीं हो रहा है। हर जगह सन्नाटा पसरा है। ऐसा लगता है पूरे देश में मातम है। जीवन में कभी ऐसा भी दौर कभी आएगा, यह तो किसी ने सोचा नहीं था।

जनता पहले से ही बेजार थी। कोरोना संक्रमण की मार ने पहले उसकी रोज़ी-रोटी छीनी। केंद्र औ राज्य के सरकारी कर्मचारियों को छोड़ दें, तो देश का हर कामकाजी नागरिक कोरोना वायरस का शिकार हो गया है। कोरोना जनता के विनाश का सामान लेकर आया है। इस वैश्विक महामारी को रोकने के लिए लॉकडाउन घोषित किया गया। पहले लगा यह पखवारे या महीने भर चलेगा। लेकिन कोरोना का विस्तार तीन महीने बाद भी बढ़ रहा है। अब तो विस्फोट हो रहा है। लोग पंद्रह हज़ार से अधिक लोग रोज़ाना संक्रमित हो रहे हैं और मौतें भी लगभग साढ़े चार सौर हो चुकी है। इससे जो कामकाज ठप है, पता नहीं कब तक ठप रहेगा। काम देने वालों ने कह दिया, ‘काम नहीं तो पैसे नहीं’, लेकिन पेट तो रोज़ाना दो जून की रोटी मांगता है।

कोरोना ने सबसे पहले निचले तबक़े यानी शारीरिक श्रम करने वाले मजदूर वर्ग पर हमला किया। लोग भूखे मरने लगे। लिहाज़ा, उस जगह पलायन करने लगे, जहां भोजन मिलने की गुंजाइश थी। भोजन देने के मामले में शहर के मुक़ाबले गांव ज़्यादा उदार होता है, इसीलिए गांव में ज़िंदा रहने की संभावना शहर से अधिक होती है। लिहाज़ा, जिसे जो भी साधन मिला, वह उसी से गांव की ओर पलायन कर गया। जिन्हें कोई साधन नहीं मिला, वे पैदल ही गांव की ओर भाग खड़े हुए।

कोरोना की मार उसके बाद निम्न मध्यम वर्ग पर पड़ी। जो नौकरी करके अपना और अपने परिवार का पेट भर रहा था। लेकिन लॉकडाउन की लंबी अवधि के दौरान अधिकतर लोगों की नौकरी चली गई। अब न तो उनके पास नौकरी रह गई न ही कोई रोजगार रहा। यूं तो सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन करते देश की कंपनियों और कारोबारियों से अपील की थी कि लॉकडाउन के दौरान किसी कर्मचारी को न तो नौकरी से निकालें और न ही उनका वेतन काटें। केवल मुनाफ़े में विश्वास करने वाली कंपनियों ने सरकार की अपील को कूड़ेदान में डाल दिया।

जो कंपनियां कर्मचारियों के बल पर करोड़ों रुपए का मुनाफ़ा कर रही थीं, लेकिन कभी भी अपने मुनाफ़े का थोड़ा सा भी हिस्सा कर्मचारियों से शेयर नहीं किया, वे कंपनियां अपने घाटे को कर्मचारियों से शेयर कर रही हैं। सरकार की अपील के बावजूद या तो कर्मचारियों को निकाल बाहर कर रही हैं या उन्हें नाममात्र का वेतन दे रही हैं। वेतन इतना कम हो गया है, कि खाने के बाद कुछ बच ही नहीं रहा है। फिर घर का किराया कैसे दें?

यही हाल मध्यम वर्ग का है। उसके पास काम तो नहीं है, लेकिन कुछ सेविंग थी, उसी से दो जून की रोटी जुटा रहे थे। इस वर्ग की सबसे बड़ी समस्या थी, कर्ज कि किस्तें कैसे भरें, क्योंकि इस वर्ग के अधिकतर लोगों ने कर्ज ले रखा है। ज़्यादातर लोग होम लोन लेकर फंस गए हैं। सरकार उन्हें मारने के लिए कर्ज स्थगन यानी मोरेटोरियम नाम की स्कीम लेकर आई। यानी लॉकडाउन में छह महीने कर्ज की किस्त मत भरिए। यह भी बैंकों या वित्तीय संस्थानों को कोई आदेश नहीं था, उनसे रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने अपील की थी।

कर्जदाता बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने आरबीआई की अपील मान ली। कर्ज लेने वालों से कहा, “संकट की इस घड़ी में हम भी आपके साथ हैं। आप आर्थिक संकट में हैं तो छह महीने तक ईएमआई मत भरिए। हां, ब्याज माफ नहीं किया जा सकता। लिहाज़ा, ब्याज जारी रहने से कर्ज के भुगतान की अवधि छह महीने आगे खिसक जाएगी। इसके अलावा आपको ब्याज के रूप में तीन महीने की अतिरिक्त किश्त देनी होगी।” यानी मातम के इस मौसम में भी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के दोनों हाथ में लड्डू हैं। ये लोग कोरोना को धन्यवाद दे रहे हैं कि उनके लिए कमाने का आवसर लेकर आया।

अभी तो कोरोना से लोगों की मौत हो रही है। यह पहला फेज है। इसके बाद दूसरा फेज आएगा। कर्ज अदा न कर पाने से बड़ी तादाद में लोग डिफॉल्टर घोषित किए जाएंगे। जिन्होंने होम लोन ले रखा है, उनके घर सील हो जाएंगे। तब उनके पास न रहने को घर होगा, न काम होगा और न ही दो जून की रोटी नहीं होगी। इसके चलते लोग सामूहिक रूप से आत्महत्या करना शुरू करेंगे, क्योंकि उनके पास मौत को गले लगाना ही एकमात्र विकल्प होगा।

बदहाल यानी शव में तब्दील हो चुकी जनता बुरी तरह पराश्रित हो गई है। सरकार के लिए शव में तब्दील हो चुकी जनता से पैसे बनाने का ज़बरदस्त मौक़ा हाथ लग गया है। इसीलिए जून के पहले हफ़्ते से पेट्रोल डीजल के दाम को रोज़ाना बढ़ाया जा रहा है। कभी किसी ने कल्पना की थी, कि ऐसा भी समय आएगा। ऐसे समय जब लोगों जीने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन पर और बोझ डालने का काम किया जाएगा।

दरअसल, मानवता का तकाजा यह है कि जहां लोग बड़ी तादाद में मर रहे हों, वहां कोई भी संवेदनशील आदमी या संस्थान न तो राजनीति करता है और न ही सौदेबाजी करता है, लेकिन देशभक्त सरकार मातम के माहौल में भी अपनी तिजोरी भर रही है। लोग हैरान हैं कि सरकार जनता की पीड़ा महसूस क्यों नहीं कर रही है। कई लोगों का मानना है कि जनता की पीड़ा, जनता का दुख वही महसूस कर सकता है, जिसे दुनियादारी का अनुभव होता है। जिसे दुनियादारी का कोई अनुभव ही नहीं है, वह लोगों के दुख-दर्द नहीं समझ सकता। कोई असंवेदनशील आदमी ही मातम के इस दौर में जब लोग रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, किसी वस्तु के दाम में वृद्धि करने की सोचेगा। यहां तो रोज़ाना पेट्रोल-डीज़ल कीमत रोज़ बढ़ाए जा रहे हैं, जिनका असर निश्चित तौर पर बाक़ी वस्तुओं की क़ीमत पर पड़ेगा।

हां, जो लोग राज्य सरकार या केंद्र सरकार में मुलाज़िम हैं, उन्हें नियमित रूप से पैसे मिल रहे हैं। यानी उनका पेट भरा है। सुबह नाश्ता, दोपहर लंच और शाम को डिनर कर रहे हैं। उन्हें आने वाले कल में भी रोटी की कोई किल्लत नहीं होने वाली है। ऐसे लोग ज़रूर सोशल मीडिया पर देशभक्ति का ज्ञान बांट रहे हैं। कहना न होगा कि आज़ादी मिलने का बाद आम नागरिक के लिए यह सबसे कठिन समय है। ऐसे में यही कहा जा सकता है, ईश्वर सबको सद्बुद्धि दे और प्रकृति मजलूम लोगों की रक्षा करे।

लेखक का परिचय:—
सदस्य महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी
Former Editor at Aarogya Sanjeevani
Former Journalist at tv9
Former Bureau chief at FOCUS TV, Mumbai
Former Sr. Correspondent at United News of India (UNI)
Former Chief of Bureau at United News of India (UNI)
Former Journalist at United News of India (UNI)
Studied at University of Jammu, Jammu
Studied Hindi Literature at University of Mumbai
Studied English, Political Science, History at Osmania University

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